गलत सहने की सामंजस्यता हमारी मौलिकता खत्म कर देती है

Samachar Jagat | Tuesday, 16 Jul 2019 03:35:16 PM
The harmony of wrong tolerance eliminates our originality

धैर्य का अर्थ सब कुछ सहन करना नहीं होता है, धैर्य का अर्थ होता है कि धारण करने योग्य बातों, कार्यों, घटनाओं और अन्य चीजों को लेने के लिए, ग्रहण करने के लिए बेशक थोड़ा कष्ट सहन करना पड़े तो भी उसे सहने से हमारी मौलिकता में निखार आएगा, वह कम नहीं होगी, खत्म नहीं होगी। इसलिए सामंजस्य वहीं तक उचित है जहां तक यह परिस्थितियों से निकलने लायक हो, उनमें फंसने तक बाहर निकलने का इंतजार नहीं करे।

इसे समझने के लिए एक कहानी है- यदि किसी मेंढक़ को उबलते हुए पानी में डाल दिया जाए तो वह उसमें से तुरंत छलांग लगा देगा और अपने जीवन को हर हालत में बचा लेगा। लेकिन यदि उसी मेंढक़ को साधारण से गर्म पानी में डाल दिया जाए तो वह बाहर निकलने का जरा सा भी प्रयास नहीं करेगा और बाहर निकलने के ठीक विपरीत अपने शरीर के साथ उस गर्म पानी से सामंजस्य करना शुरू कर देगा। उसके मन-मस्तिष्क में यह बिल्कुल भी नहीं आएगा कि ऐसी शुरुआत, ऐसी आदत एक दिन उसकी मृत्यु का सबसे बड़ा कारण बन जाएगी। अब धीरे-धीरे पानी गरम हो रहा है, जैसे-जैसे पानी गर्म हो रहा है वैसे-वैसे मेंढक़ अपने शरीर को उस गर्म पानी के साथ एडजस्ट करने लगता है।

मेंढक़ अपनी ऊर्जा को अपनी शक्ति को, अपनी समर्थतता को धीरे-धीरे खोने लगता है, कम करने लगता है, वह अंदर ही अंदर घुटने लगता है, परेशानी महसूस करने लगता है लेकिन वह उस बनती परिस्थिति से अपने आपको बाहर नहीं निकाल पाता है। अब पानी और थोड़ा गर्म होने लगता है तो मेंढक़ और अधिक ऊर्जा को गर्म पानी के साथ एडजस्ट करने में खर्च करता है, लेकिन बाहर निकलने की बिल्कुल भी नहीं सोचता है और एक समय ऐसा आता है कि अब पानी में उबाल आने लगता है और मेंढक़ की एडजस्ट करने की शक्ति जवाब देने लगती है और वह अंत में दम तोड़ देता है।

 यही कमोबेश स्थिति व्यक्ति की होती है वह भी अन्याय सहने, गलत सहने को प्राथमिकता देता है। यदि वह किसी गलत काम का विरोध शुरू में ही कर दे, ना कहना सीख ले तो वह कुछ पाकर ही अपने को बचा सकता है और उसकी इस आदत से वह ताउम्र अच्छे से रह पाएगा, अच्छे से कर पाएगा। लेकिन वह सोचता है, थोड़ा गलत सहने में क्या जाता है, सहन कर लेता हूं, तो बस इसी सोच के कारण वह अपने स्वाभिमान को, सम्मान को और अपने समस्त जीवन को बेच चुका होता है और दिन में मरने लगता है हजारों बार। आइए, हम स्वयं से यह कमिटमेंट करें कि किसी भी स्थिति-परिस्थिति में अपने स्वाभिमान-सम्मान को गिरवी नहीं रखे, स्पष्ट रहे, सरल रहे, एक रहे नेक रहे, फिर हमेशा आपकी मौलिकता आपके पास रहेगी। आप हमेशा जीवित रहेंगे शान से।

प्रेरणा बिन्दु:- 
क्यों गलत करे क्यों गलत सहें
नित सच्चे सरल स्पष्ट रहें
सिर ऊंचा होगा देश धर्म का
मानव हैं बस मानव रहें।
 



 

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