चंडीगढ़। मुनिश्री विनयकुमार जी आलोक ने कहा कि गुरूदेव तुलसी ने 11वर्ष की आयु में मुनि बने पूज्य कालूगणी से जैन दीक्षा को स्वीकार किया। वे प्रारंभ से ही प्रतिभाशाली थे। अनुशासन के गहरे हिमायती थे। 16 वर्ष की अवस्था में वे छोटे मुनियों को पढाने का कार्य प्रारंभ किया। जिसे तुलसी पाठशाला कहा जाता था और उसी पाठशाला के एक छात्र थे आचार्य श्री महाप्रज्ञ।
उन्होने ऐसे नवीन केंद्र स्थापित किये जो शायद किसी के दिमाग में आए ही नही। गुजराती वरिष्ठ साहित्यकार दलसुखभाई मालवणियां कहते थे कि ये 13 पंथ से ही ऐसे कार्य प्रारंभ होते है और से क्यों नही। गुरूदेव तुलसी ने समस्त समाज जो रूढियों मृत्यु भोज, घूंघट प्रथा, नशे का सेवन ऐसी ना जाने कितनी कुप्रथाओं में जकड़ा हुआ था, उन्होने अंधकार से निकालकर उजाले की ओर अग्रसर किया।
समाज में बदलाव लाना हर एक व्यक्ति के बस की बात नही होती समाज को वही व्यक्ति बदल सकता है जिसने कुछ करने की ठानी हो, अपने शरीर की भी जिसे परवाह नही होती। खान पान, शयन आदि पर जिसका नियंत्रण हो, विरोधो से जो न घबराए विरोध को विनोद समझे ऐसा व्यक्ति ही समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन कर सकता है। आचार्य तुलसी ऐसे ही व्यक्ति थे जिन्होने 36कोमों में बदलाव किया।
ये विचार मुनिश्री विनयकुमार जी आलोक ने गुरूदेव तुलसी के 92वें दीक्षा दिवस पर अणुव्रत भवन तुलसीसभागार में आयोजित सभा में कहे। उन्हाने कहा अणुव्रत की शक्ति अमाप्य है कार्य अतुल्य है इसे शब्दों में बया नही किया जा सकता और तुला में तोला नही जा सकता।
हर कार्य क्षेत्र में मजबूती के साथ कार्य किया है। सदियों से लगातार स्त्री को पैर की जूती मानने वाले समाज में आचार्य तुलसी ने जिस तरह से महिलाओं के अधिकारों और उन्हे समाज में उठकर जीने का साहस दिया वह कोई हसी खेल नही था पर दृंढ संकल्प के साथ लगे और महिलाओं में घूंघट प्रथा का अंत किया। कार्यक्रम का संचालन अणुव्रत समिति के अध्यक्ष मनोज जैन ने किया।