मनोजवं मारूततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये।।
श्रीराम-सीता को वक्ष-स्थल में हर घड़ी धारण करने वाले एकमात्र श्री हनुमान जी महाराज कलयुग में साक्षात् दर्शन दे रहे हैं तथा जहां कहीं भी रामकथा होती है वहां हनुमान जी महाराज कथा-श्रवण हेतु उपस्थित रहते हैं। ऐसा ही एक परमपुरातन मंदिर श्रीघाट के बालाजी का गुलाबी नगर जयपुर के पूर्व दिशा आंचल में स्थित है। जयपुर में पुराना घाट और सिसोदिया रानी महल (गार्डन) से कुछ ही किलोमीटर दूर गलता मार्ग पर प्रकृति व पहाड़ों की दुर्गम तलहटी में श्रीघाट के बालाजी महाराज विराजते हैं।
अणुव्रत की शक्ति अमाप्य: मुनिश्री
बालाजी की प्रतिमा प्रकृति के मध्य इसीलिए विराजती है कि इसका प्राकट्य प्रकृति से ही हुआ है। अत: जहां प्रकट भये वहीं सुस्थापित हो गए। मंदिर निर्माण में तदनन्तर गलता तीर्थ के अंतर्गत हो पाया। गालव ऋषि की तपोभूमि श्री गलताजी जहां आज भी गालव ऋषि की तपोस्थली (गुफा) मौजूद है और भक्तों की शरणस्थली है।
वर्तमान गलतापीठाधीश्वर पं. अवधेश कुमार जी हैं तथा उनके लघु भ्राता पं. सुरेश कुमार मिश्रा घाट के बालाजी मंदिर प्रबंधकीय पीठाधीश्वर हैं। आप दोनों ही ब्रह्मलीन वेदज्ञानी पं. रामोदराचार्य के आत्मज है अत: स्थापित ट्रस्ट के माध्यम से ही घाट के बालाजी मंदिर परिसर में सेवा-पूजा-अर्चना सुसम्पादित हो रही है।
ब्रह्मलीन पीठाधीश्वर रामोदराचार्य जी भी तपस्वी रहे हैं तथा त्रिवेणी धाम (शाहपुरा) से ही दीर्घकालीन भक्ति उपरान्त पधार पाए थे। आज भी धर्म प्रवृतियों का गलताजी तीर्थ एवं घाट के बालाजी मंदिर स्थल पर विकास व उत्थान हो रहा है उसका श्रेय वर्तमान पीठाधीश्वर द्वारा ब्रह्मलीन रामोदराचार्यजी महाराज के आशीर्वाद को ही दिया जा रहा है। स्वामी रा.चार्य का चित्र भी मंदिर परिसर में टंका हुआ है।
घाट के बालाजी की खड़ी प्रतिमा पर प्रतिदिन सिंदूर से चोला चढ़ाया जाता है, नई पोशाक धारण कराई जाती है तथा रजत मुकुट व कुण्डल धारण कराकर आरती उतारी जाती है। मंगला झांकी से रात्रि शयन आरती तक पांच झांकियां एवं दिन में राजभोग झांकी भी थाल का भोग के साथ सजायी जाती है। मंदिर प्रबंध ने बतलाया कि प्रतिदिन समय विभाग चक्र अनुसार सेवा व झांकियां समाहित हो रही है।
इस मंदिर में छिपाए थे पांडवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र
वर्तमान में सहयोगी पुजारी श्यामजी शर्मा सेवापूजा में भक्तिभाव से संलग्न है। मंगलवार एवं शनिवार को दर्शनार्थियों की अधिक भीड़ लगी रहती है क्योंकि विशेष झांकी सजाई जाती है तथा जिन भक्तों के मान्यता है वे भोग की रसोई भी करते हैं तथा जन्मजात, जडूला, चोटी, विवाह जात आदि-आदि संस्कार माला सम्पन्न कराई जाती रहती है। यह विशेष उल्लेखनीय है कि घाट के बालाजी मंदिर परिसर में अन्य पुरातन मंदिरों की प्रतिमाएं भी विराजमान है। ऊपर की मंजिल में पुरातन शिवालय स्थित है।
शिवालय के बाहर के परिसर में पंच गणेश देव प्रतिमाएं दीवार पर उत्कीर्ण हो रखी हैं जो काफी पुरातन व प्राचीन शिल्य में दृष्टव्य है। दर्शनीय है। घाट के बालाजी की बाईं ओर स्थित अलग कक्ष में भगवान राम-सीता मंदिर व शालिगरामजी सेवा विराजमान है।
दाईं ओर रसोवड़ा स्थापित है। वर्तमान में मंदिर की पुरातन शिष्य कला के अंतर्गत खुले हवादार झरोखे, जालियां, छतरियां, सौन्दर्य बिखेर रही है, वहीं मुख्य प्रांगण में नव निर्माण हुआ है। आसमान से आने वाली धूप व वर्षा से छाया व सुरक्षा संभव हो गई है। अत: सामूहिक भव्य अखण्ड रामायण पाठ नवान्हपारायण, नवरात्रा, अनुष्ठान, अन्नकूट महोत्सव आदि-आदि प्रवर्तिया समय-समय पर भव्य रूप में सम्पन्न हो पाती है।
धर्मप्रेमी पं. रमेश जी शर्मा सुंदर कांड पाठ का आयोजन करते रहते हैं। मंदिर की प्राकृति शोभा व शिल्प कला तो भारत के सिने निर्माताओं एवं अभिनेताओं व निर्देशकों को आकर्षित करते रहते हैं। मंदिर के ऊपर चढ़ने की सीढि़यां व तोरण द्वार अति सुंदर व दर्शनीय हैं जहां पर विदेशी पर्यटक फोटोग्राफ करवाकर विदेशों तक में ले जाते हैं।
अत: घाट के बालाजी का पुरातन व ऐतिहासिक सिद्ध स्थान (मंदिर) तीर्थ व रमणीय भ्रमण-स्थल बनता चला जा रहा है तथा यात्रियों की सुविधा हेतु नए-नए मार्ग व निर्माण व रसोई स्थल बनाए जा रहे हैं। यहां नीचे परिसर में पुरातन जल कूप व हरा भरा लॉन भी है।
हमारी विनती है: निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करै सनमान।
तेहि के कारज सकल सुभ, सिद्धि करैं हनुमान।।