मंदिर वहीं बनेगा, मस्जिद के लिए दूसरी जगह जमीन दे सरकार

Samachar Jagat | Saturday, 09 Nov 2019 10:20:58 PM
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लंबे इंतजार के बाद बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि जमीन विवाद मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसला आ गया. मंदिर-मस्जिद के नाम पर सालों से सियासत हो रही थी. कइयों की जानें जा चुकीं थीं और इसे लेकर देश में अलग तरह का तनाव पसरा रहता था. माना जा रहा है कि इस फैसले ने बरसों से चले आरहे विवाद पर विराम लगाया. फैसला भले हिंदुओं के पक्ष में गया और जमीन उन्हें सौंप दी गई. मुसलमानों को मस्जिद के लिए पांच एकड़ जमीन देने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया. हालांकि इस फैसले को मध्यस्था जैसा भी माना जा रहा है. लेकिन आमतौर पर फैसले के बाद देश भर में माहौल में किसी तरह का तनाव नहीं है.


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सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को अयोध्या के जमीन विवाद मामले में सर्वसम्मति के फैसले में अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया और केंद्र को निर्देश दिया कि नई मस्जिद के निर्माण के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को प्रमुख स्थान पर पांच एकड़ का भूखंड आबंटित किया जाए. मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ ने इस व्यवस्था के साथ ही राजनीतिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील 134 साल से भी अधिक पुराने इस विवाद का पटाक्षेप कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या केस पर फैसला सुनाते हुए कहा है कि विवादित ढांचे की जमीन हिंदुओं को दी जाएगी और मुसलमानों को मस्जिद बनाने के लिए दूसरी जगह मिलेगी. कोर्ट ने शुरू में ही शिया वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़ा की याचिकाएं खारिज कर दीं. फैसला सभी जजों की सहमति से हुआ है. रंजन गोगोई ने कहा कि पुरात्व विभाग ने मंदिर होने के सबूत पेश किए हैं. सैकड़ों पन्नों का फैसला पढ़ते हुए पीठ ने कहा कि हिंदू अयोध्या को राम जन्मस्थल मानते हैं. रंजन गोगोई ने कहा कि कोर्ट के लिए थिओलॉजी में जाना उचित नहीं है. लेकिन पुरातत्व विभाग यह भी नहीं बता पाया कि मंदिर गिराकर मस्जिद बनाई गई थी.

मुसलिम गवाहों ने भी माना कि दोनों पक्ष पूजा करते थे. मस्जिद कब बनीं साफ नहीं है. एएसआई की रिपोर्ट के मुताबिक खाली जमीन पर मस्जिद नहीं बनाई गई थी. प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि सबूत पेश किए गए हैं कि हिंदू बाहरी आहते में पूजा करते थे. विश्वास एक व्यक्तिगत एक मामला है. सूट-पांच इतिहास के आधार पर है जिसमें यात्रा का विवरण है. सुन्नी वक्फ बोर्ड के लिए शांतिपूर्ण कब्जा दिखाना असंभव है. मस्जिद कब बनी और किसने बनाई साफ नहीं है. 856-57 से पहले हिंदुओं को आंतरिक अहाते में जाने से कोई रोक नहीं थी. मुसलिमों को बाहरी आहाते का अधिकार नहीं था.

सुन्नी वक्फ बोर्ड एकल अधिकार का सबूत नहीं दे पाया. आखिरी नमाज दिसंबर 1949 को पढ़ी गई थी. हम सबूतों के आधार पर फैसला करते हैं. मुसलमानों को मस्जिद के लिए दूसरी जगह मिलेगी. केंद्र सरकार तीन महीने में योजना तैयार करेगी. योजना में बोर्ड ऑफ ट्रस्टी का गठन किया जाएगा. फिलहाल अधिग्रहीत जगह का कब्जा रिसीवर के पास रहेगा. सुन्नी वक्फ बोर्ड को पांच एकड़ जमीन मिले. केंद्र सरकार तीन महीने में योजना तैयार करेगी. योजना में बोर्ड ऑफ ट्रस्टी का गठन किया जाएगा. केंद्र या राज्य सरकार अयोध्या में ही मस्जिद के लिए प्रमुख जगह पर ज़मीन दे. सरकार को मंदिर बनाने के लिए ट्र्स्ट बनाना होगा. सभी जजों की सहमति से फैसला हुआ है. रामलला विराजमान को दिया गया मालिकानी हक, देवता एक कानूनी व्यक्ति यह भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से साबित हो गया. 

अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद मामले पर फैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जमीयत उलेमा ए हिन्द के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि फैसला हमारी उम्मीदों के खिलाफ है लेकिन सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च संस्था है. उन्होंने देशवासियों से अपील की कि वे इस निर्णय को हार-जीत की दृष्टि से न देखें और देश में अमन व भाईचारे के वातावरण को बनाए रखें.

मदनी ने कहा कि देश के संविधान ने हमें जो शक्तियां दी हैं उस पर निर्भर करते हुए जमीयत उलेमा हिन्द ने आखिरी हद तक न्याय के लिए लड़ाई लड़ी. देश के मशहूर वकीलों की सेवाएं प्राप्त कीं. अपने पक्ष में तमाम सबूत इकट्ठे किए और अदालत के सामने रखे गए. अपने दावे को शक्ति प्रदान करने के लिए हम जो कर सकते थे वह किया. हम इसी बुनियाद पर आशावान थे कि निर्णय हमारे पक्ष में आएगा. जमीयत उलेमा हिन्द के सूत्रों का कहना है कि अयोध्या मामले में बाबरी मस्जिद के पक्ष की पैरवी करने वाला जमीयत अब पुनर्विचार याचिका दायर नहीं करेगा. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).


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