40 वर्ष तक अपने ज्ञान से देश में रोशनी फैलाई थी राधाकृष्णन ने

Samachar Jagat | Tuesday, 17 Apr 2018 01:39:55 PM
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नेशनल डेस्क। एक मां और पिता अपने बच्चें के जीवन के पहले गुरू होते है और उनकी दी हुई शिक्षा उसके जीवन की पहली सीढ़ी होती है, उसके बाद दूसरा नंबर आता है शिक्षक का शिक्षक से मिलने वाली शिक्षा ही बच्चे के पूर्ण जीवन को सार्थक बनाती है। आज हम एक ऐसे ही अध्यापक के जीवनी के बारे में बताने जा रहे जिसने अपने ज्ञान से 40 वर्ष तक देश में रोशनी तो फैलाई ही है इसके अलावा देश के उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति के तौर पर देश को आगे भी बढ़ाया है और उनका नाम है डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जिनकी आज पुण्यतिथि है।

भारत के दूसरे राष्ट्रपति के तौर पर भी है पहचानः

भारत के दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की आज पुण्यतिथि है। भारत के दूसरे राष्ट्रपति के तौर पर देश को शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने ऊचाइयां भी प्रदान की है। राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर को हुआ था। शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान के लिए हर साल 5 सितंबर को उनकी याद में शिक्षक दिवस मनाया जाता है।

रह चुके है कुलपतिः 

राधाकृष्णन काशी हिंदू विश्वविद्यालय में बतौर कुलपति भी अपनी सेवा दे चुके है। शिक्षा के प्रति समर्पण का भाव ऐसा था कि बतौर कुलपति वेतन लेने से भी परहेज करते थे। पं. मदन मोहन मालवीय के खराब स्वास्थ्य के कारण जब डाॅ. राधाकृष्णन ने विश्वविद्यालय की कमान बतौर कुलपति संभाली, तब देश गुलाम था। 

कब बने उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपतिः

13 मई 1952 को उन्हें देश का पहला उपराष्ट्रपति बनाया गया। दस वर्षों तक बतौर उपराष्ट्रपति जिम्मेदारी संभालने के बाद 13 मई 1962 को उन्हें देश का दूसरा राष्ट्रपति बनाया गया। आपकों बतादें की जवाहर लाल नेहरू के आग्रह पर ही राधाकृष्णन का राजनति में आगमन हुआ था।

मिला था भारत रत्नः

आपकों बतादें की शिक्षा और राजनीति के क्षेत्र में उनके कार्य को देखते हुए उस समय सरकार ने उनकों देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया था। 1962 में ही उन्हें ब्रिटिश एकेडमी का सदस्य बनाया गया। इंग्लैंड की सरकार ने उन्हें ‘ऑर्डर ऑफ मेरिट’ स्म्मान से सम्मानित किया था।

डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन की वो बातें जो सफलता की कुंजी हुई साबितः

शिक्षक का काम सिर्फ विद्यार्थियों को पढ़ाना ही नहीं है बल्कि पढ़ाते हुए उनका बौद्धिक विकास भी करना है।
शिक्षा मानव और समाज का सबसे बड़ा आधार है।

अच्छा शिक्षक वह है, जो ताउम्र सीखता रहता है और अपने छात्रों से सीखने में भी कोई परहेज नहीं करता हो।

उच्च नैतिक मूल्यों को अपने जीवन में उताकर उसे आत्मसात करे।

शिक्षक समाज का निर्माता होता है, समाज के निर्माण में उसकी अहम भूमिका होती है। 

कोई भी आजादी तब तक सच्ची  नहीं होती है, जब तक उसे पाने वाले लोगों को विचारों को व्यक्त करने की आजादी न दी जाए।

शिक्षक वह नहीं, जो तथ्यों को छात्रों के दिमाग में जबरन डालने का प्रयास करे, सही मायने में शिक्षक वही है, जो उसे आने वाली चुनौतियों के लिये तैयार करे।

पुस्तकें वह माध्यम हैं, जिनके जरिये विभिन्न संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण किया जा सकता है।

ज्ञान के माध्यम से हमें शक्ति मिलती है, प्रेम के जरिये हमें परिपूर्णता मिलती है।

हमें तकनीकी ज्ञान के अलावा आत्मा की महानता को प्राप्त करना भी जरूरी है।

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