कांग्रेस को अपने नेतृत्व, संगठन और विचारधारा पर मंथन करना होगा

Samachar Jagat | Wednesday, 29 May 2019 10:49:54 AM
Congress has to churn on its leadership, organization and ideology.

लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस में खलबली है। हार के कारणों पर विचार के लिए बीते शनिवार को कांगे्रस कार्य समिति की बैठक हुई। कहा जा रहा है कि पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस्तीफे की पेशकश की लेकिन इसे खारिज कर दिया गया। चुनाव नतीजों के बाद हारे हुए दल अपनी कमजोरियों की समीक्षा करते ही है। जिन दलों को उम्मीद से कम सीटें मिलती है, वे भी अपनी रणनीति पर मंथन करते हैं। फिर वे अगले चुनाव के लिए नए ढंग से मैदान में उतरने का साहस भरते हैं। पर इस लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद जैसी हताशा विपक्षी दलों में नजर आ रही है, वह उनके साहस खो देने का संकेत देती है। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के सामने 17वीं लोकसभा के चुनाव नतीजों ने चौतरफा संकट पैदा कर दिया है। 2014 के लोकसभा चुनाव में 44 सीटों पर सिमटने वाली कांग्रेस इस बार मात्र 8 सीट अधिक हासिल कर इस बार 52 सीटों तक ही पहुंच पाई है। 

इन निराशाजनक नतीजों के बाद जैसा कि ऊपर लिखा गया है कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपना पद छोड़ने की पेशकश की और पार्टी की सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्था कांग्रेस कार्य समिति ने उसे ठुकरा दिया। कार्य समिति ने राहुल को कांग्रेस में आमूलचूल परिवर्तन करने के लिए अधिकृत कर दिया। लेकिन कांग्रेस का संकट इससे कहीं ज्यादा गहरा है। कुछ माह पहले मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ को भाजपा से छीनकर कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में शानदान प्रदर्शन कर केंद्र में लौटने की आस जगा दी थी। लेकिन लोकसभा चुनावों में इन तीन राज्यों में भी कांग्रेस सम्मानजनक स्थिति में नहीं आ पाई। राजस्थान समेत 18 राज्यों में कांग्रेस खाता तक नहीं खोल पाई। ये परिणाम कांग्रेस में आत्म चिंतन करने के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इस बार लोकसभा की सियासी जंग कांग्रेस ने अपने नए एवं युवा अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में लड़ी। चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने अपना तुरूप का पत्ता मानी जाने वाली प्रियंका वाड्रा गांधी को भी सक्रिय तौर पर राजनीति में उतार दिया। लेकिन उनका करिश्मा भी नहीं चल पाया। राहुल-प्रियंका की जोड़ी कांग्रेस को इतनी सीटें भी नहीं दिला पाई कि लोकसभा में उसे विपक्ष का नेता पद मिल जाए। 2014 में हार के कारणों की समीक्षा के लिए गठित एंटनी कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि राहुल गांधी का नेतृत्व हार का कारण नहीं है। 

कमेटी ने मुसलमानों का तुष्टीकरण और हिंदुत्व से दूर जाने की नीति को हार की मुख्य वजह माना था, पर अब इस हार से कांग्रेस के सामने कई संकट खड़े हो गए हैं। किसी भी दल की सफलता के लिए उसके पास संगठन, विचारधारा और नेतृत्व की आवश्यकता होती है। कांग्रेस के पास इन तीनों का अभाव साफ दिखता है। संगठन के तौर पर कांग्रेस का देश भर में ढांचा अवश्य है, लेकिन वह नेहरू-गांधी परिवार के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया है। उसमें चापलूस और वातानुकूलित कमरों में बैठकर राजनीति करने वाले ज्यादा है। उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे राज्यों में कांग्रेस का ढांचा कहीं नहीं दिखता है, जबकि पश्चिम बंगाल और अब आंध्र प्रदेश में कांग्रेस से निकले नेता अपनी जमीन तैयार कर चुके हैं। कांग्रेस में कहा जाता है कि राज्यों से भी यह विभिन्न नेताओं के गुटों का समूहभर है, जो एक दूसरे के खिलाफ लड़ते रहते हैं, लेकिन सभी की आस्था गांधी-नेहरू परिवार के प्रति होती है। 

नेतृत्व के लिए कांग्रेस गांधी-नेहरू परिवार से इतर सोच भी नहीं सकती है। जबकि इस बार परिवारवाद की राजनीति भी नरसिंह राव भी कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे, जिनकी उदार आर्थिक नीतियों से देश में आर्थिक समृद्धि के द्वार खुले। अब भी कैप्टन अमरेंदर सिंह जैसे नेता है जिन्होंने मोदी-शाह के विजय रथ को पंजाब में रोक दिया। तीसरा बड़ा संकट विचारधारा का है। कांग्रेस भले ही महात्मा गांधी के विचारों पर चलने का दावा करे, लेकिन वह अब वामपंथ के ज्यादा करीब दिखती है। जिस तरह से भाजपा को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से वैचारिक खुराक मिलती है, कांग्रेस के पास गांधी विचारकों का अभाव है। दरअसल कांग्रेस को अपने नेतृत्व, संगठन और विचारधारा पर ध्यान देने की आवश्यकता है। 21वीं सदी के भारत में अब उन मुद्दों पर राजनीति नहीं हो सकती, जिन पर नेहरू-इंदिरा के जमाने में होती थी। कांगे्रस को समझना होगा कि भारत बदल रहा है। यहां यह बता दें कि कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगता रहा है। इससे पार पाने के मकसद से ही करीब 15 साल पहले पार्टी के बुराड़ी अधिवेशन में राहुल गांधी ने महासचिव बनने के बाद अपना प्रस्ताव रखा था कि चुनावों में टिकट प्रत्याशी के कामकाज और जमीनी पकड़ को देखते हुए दिया जाना चाहिए, न कि परिवार के आधार पर। मगर यह प्रस्ताव पार्टी के भीतर चुपके से दफन कर दिया गया। 

यहां तक कि जब राहुल गांधी खुद अध्यक्ष बने तब भी वे अपने प्रस्ताव को याद नहीं रख पाए। अपने वरिष्ठ नेताओं को उसके लिए मना नहीं पाए। अब उनके पद छोड़ने से पार्टी की स्थिति सुधर जाएगी, दावा नहीं किया जा सकता। इससे भाजपा को और लाभ मिलेगा, जैसा कि प्रियंका गांधी ने कहा भी। इसलिए अगर कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों में इसी तरह हार से उपजी हताशा बनी रही तो वह उन्हीं के लिए नुकसानदेह साबित होगा। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि कांग्रेस ने अर्थशास्त्रियों के मशविरे से किसानों के लिए योजना तो बनाती है, लेकिन उसके पास ऐसा कोई नेता नहीं है, जो किसानों के साथ रोज उठता-बैठता हो और उनका दु:ख-दर्द पूछता हो। कांग्रेस जनता से संवाद के नए तरीके नहीं ढूंढ पाई।

आज सोशल मीडिया के इस दौर में जनता तक अपनी बात पहुंचाने के लिए नए सूत्रों, नए मुहावरों की जरूरत है। जिसे भाजपा ने बेहतर समझा है। कांग्रेस ने मोदी को जुमलेबाज तो कहा पर उनके जुमलों की काट नहीं खोज पाई। सोशल मीडिया जैसे प्लेटफार्म पर कभी कांग्रेस की मुखर उपस्थिति नजर नहीं आई। कांग्रेस अपनी पहचान को लेकर भी दुविधा में है। इसे तय करना होगा कि वह अपना धर्मनिरपेक्ष स्वरूप बरकरार रखे या उदार हिंदुत्व अपनाए। अगर कांग्रेस को प्रासंगिक बने रहना है तो उसे आमूलचूल बदलाव के लिए तैयार होना पड़ेगा।



 

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