अर्थव्यवस्था को रफ्तार देना होगी बड़ी चुनौती

Samachar Jagat | Wednesday, 05 Jun 2019 03:13:08 PM
Economy will give a big challenge

मोदी सरकार को अपने दूसरे कार्यकाल में अर्थव्यवस्था की रफ्तार बनाए रखने की बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही बढ़ते राजस्व घाटे को काबू में रखना भी बेहद जरूरी होगा। जानकारों का मानना है कि अगर सरकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार करे और लोगों के हाथों में खर्च के लिए पर्याप्त कमाई का इंतजाम किया जाए तो बड़ा सुधार संभव है। अर्थशास्त्रियों के मुताबिक भारत की बड़ी आबादी गांवों में बसती है। ऐसे में अगर सरकार ग्रामीण इंफ्रॉस्ट्रक्चर पर काम करेगी तो रोजगार के पर्याप्त मौके बन जाएंगे। साथ ही देश की कुल आबादी के एक बड़े हिस्से के पास खर्च करने की ताकत भी बढ़ेगी। मौजूदा हालात में रियल एस्टेट में सुस्ती के बाद ऑटो सेक्टर में मांग भी घटी है। गाडि़यों की बिक्री अप्रैल महीने में साढ़े सात साल के निचले स्तर पर पहुंच गई है। ऐसे में सरकार को जल्द से जल्द कदम उठाने होंगे। 

तमाम अटकलों को विराम देते हुए मोदी कैबिनेट में निर्मला सीतारमण को वित्त मंत्री बनाया गया है। शुक्रवार को वित्त मंत्री के रूप में निर्मला सीतारमण के नाम का औपचारिक ऐलान के कुछ देर बाद ही निर्मला सीतारमण वित्त मंत्रालय और कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय का कार्यभार संभालने के लिए पहुंच गई। उन्होंने आर्थिक हालात का जायजा भी लिया। आगामी जुलाई माह में आम बजट पेश करना बतौर वित्तमंत्री उनकी पहली परीक्षा होगी। सीतारमण इस नई जिम्मेदारी के साथ स्वतंत्र रूप से पहली महिला वित्तमंत्री बन गई है। पदभार संभालते हुए उन्होंने सभी अधिकारियों से बातचीत की और देश के आर्थिक हालात का जायजा भी लिया। सभी सचिवों ने बारी-बारी से इस मौके पर उन्हें देश की आर्थिक हालात का ब्यौरा देने के साथ-साथ मौजूदा चुनौतियों से भी अवगत कराया। उनके साथ वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर और वित्त सचिव भी मौजूद थे। जानकारों का मानना है कि जेएनयू से अर्थशास्त्र की पढ़ाई करने वाली निर्मला सीतारमण ने जिस तरह रक्षा मंत्रालय का कामकाज संभाला है।

ऐसे मेें वित्त मंत्रालय में भी वे कमाल करने का माद्दा रखती है। जानकारों के मुताबिक रियल एस्टेट सेक्टर को दिक्कतों से उबारने को लेकर वित्त मंत्रालय में गहमागहमी चल रही है। देखना होगा कि नई वित्तमंत्री अब उन नीतियों पर कितनी तेजी से और किस दिशा में अमल करती है। जुलाई में देश का पूर्ण आम बजट पेश किया जाना है। ऐसे में आज मंत्रालय में देश के आर्थिक हालात की जानकारी लेने के बाद जल्द ही वे अधिकारियों के साथ बजट के कामकाज में जुट जाएंगी। यहां यह बता दें कि निर्मला सीतारमण पूर्व में वित्त और कॉरपोरेट मामलों में बतौर राज्यमंत्री काम कर चुकी है। बतौर वाणिज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार भी आर्थिक मामलों का कामकाज देख चुकी है। वित्तमंत्री के तौर पर निर्मला सीतारमण को बहुचर्चित पांच मुद्दों पर पार पाना होगा। इनमें पहला बदहाल पड़े सरकारी बैंकों की स्थिति में सुधार करना बेहद अहम होगा। 

31 दिसंबर 2018 तक सरकारी बैंकों का फंसा कर्ज (एनपीए) 8.64 खरब रुपए था। वहीं आईएल एंड एफसी संकट से एनबीएफसी की भी स्थिति नाजुक है। दूसरी यह कि किसी भी देश की अर्थव्यवस्था उसके निर्यात पर निर्भर करती है। भारतीय अर्थव्यवस्था मेें निर्यात की भागीदारी 2018-2019 में कुल जीडीपी का 12.09 था। वहीं 2004-05 में यह 11.78 फीसदी थी। सरकारी प्राथमिकता में निर्यात को जल्द से बढ़ाना शामिल करना होगा। तीसरा मुद्दा है अभी देश में केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम की संख्या 339 है। इनमें से आधे से अधिक कंपनियां मुनाफा कमा रही है। वहीं बहुत सारी कंपनियां घाटे में चल रही है। ऐसी कंपनियों को बेचने या बंद करने की बात हंगामा खड़ा कर सकती है।

हर हाल में इनमें सुधार लाना होगा। चौथा मुद्दा सरकार के सामने कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार बड़ी चुनौती बनने वाली है। भारतीय जीडीपी में कृषि का योगदान गिरकर 13.14 फीसदी पर रह गया है। सरकार ने किसान सम्मान निधि की शुरुआत तो की है, लेकिन किसानों के लिए दूसरे कदम भी उठाने होंगे। पांचवां सबसे बड़ा मुद्दा है, नई नौकरियों के अवसर बढ़ाने होंगे। भारत की अनुमानित 130 करोड़ की जनसंख्या का 67 फीसदी हिस्सा कामकाजी वर्ग का है। स्किल डेवलपमेंट जैसे प्रयोग किए गए हैं, लेकिन बढ़ती युवा आबादी की नौकरी की जरूरत पूरी नहीं होगी। सरकार को नए क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करने होंगे। प्रधानमंत्री मोदी ने बीते सप्ताह शुक्रवार को नए मंत्रियों के विभागों की घोषणा की ठीक उसी दिन केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) की ओर से जारी किए गए आंकड़े देश में बेरोजगारी बढ़ने और विकास दर में गिरावट की चिंताजनक स्थिति प्रकट करती है। इन आंकड़ों के अनुसार देश में बेरोजगारी की दर 6.1 फीसदी है, जो 45 साल में सर्वाधिक है। वहीं वित्त वर्ष 2018-19 की चौथी तिमाही में आर्थिक विकास दर पांच साल के न्यूनतम स्तर 5.8 फीसदी पर आ गई है। यहां यह बता दें कि लोकसभा के आम चुनाव से पहले बेरोजगारी के आंकड़ों पर जो रिपोर्ट लीक हुई थी, उसकी शुक्रवार को सरकारी आंकड़ों में पुष्टि हो गई। 

आंकड़ों के मुताबिक देश में वित्त वर्ष 2018-19 में बेरोजगारी दर कुल कार्यबल की 6.1 फीसदी रही है। आंकड़ों के मुताबिक शहरी क्षेत्र में रोजगार योग्य युवाओं में 7.8 फीसदी बेरोजगारी रहे, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह अनुपात 5.3 प्रतिशत रहा। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार सबसे ज्यादा गिरावट कृषि क्षेत्र में देखने को मिली है। वित्त वर्ष 2017-18 में कृषि की रफ्तार 5 फीसदी थी, जो वित्त वर्ष 2018-19 में घटकर महज 2.9 फीसदी रह गई। साथ ही खनन क्षेत्र में विकास दर 5.1 फीसदी से घटकर 1.3 फीसदी रह गई है। आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद गर्ग के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2019-20 की पहली तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर अपेक्षाकृत धीमी रहेगी और दूसरी तिमाही में इसमें तेजी आएगी।



 

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