जयपुर की गगन रेखा और राजमहल

Samachar Jagat | Friday, 11 May 2018 10:50:22 AM
Gagan Line and Rajmahal of Jaipur

ईसरबाग (आतिश) के अहाते में त्रिपोलिया की तरफ अन्तरकोट से सटता विजय स्तंभ, ईसरलाट, सरगासूली कई नामों से जाने वाली लाट (मीनार) को जयपुर की गगन (आकाश) रेखा माना जाता रहा है। इसके पीछे मानसिकता या दर्शनशास्त्र यह रहा है कि 1749 ई में निर्मित यह गगन चुम्बी इमारत आकाश को छूती सी नजर आती है। सदियों पूर्व आये देशी ही नहीं विदेशी पर्यटक इस बात से इक्तफाक रखते रहे है। 19वीं सदी में दुनियां पर भ्रमण पर निकले प्रसिद्ध यूरोपीय पर्यटक और कलमकार विशोप हेवर वर्ष 1825 ई (19वीं सदी) में जयपुर भी आए थे। वो भी यहां के साफऔर खुले आसमान को देखकर चकित रह गए । विशोप हेबर ने यहां की गगन रेखा की प्रशंसा करते हुए अपने उद्गार प्रगट किए कि ‘पूरी दुनिया में उसने इससे बेहतर या सर्वोत्तम गगन (आकाश) रेखा नहीं देखी।’ सदी का यह सलाम था सवाई जयसिंह की नगरी के खुले आकाश को।

 गौरतलब और सच्चाई यह भी है कि इस सदी के मध्य के आखिर तक शहर की चार दीवारी के भीतर सिर के ऊपर की तरफ किसी प्रकार के तार नहीं लगे थे और न ही लगाने की इजाजत थी। अब बात करते हंै एक और ऊंचे या लम्बे ढांचा (महल) को जो विजय स्तंभ के निर्माण से करीब 24 वर्ष पूर्व खड़ा करा दिया गया था। सात मंजिली यह इमारत चन्द्रमहल भी शहर का उच्चतम ढांचा है (इमारत) जो जयपुर के कछवाहा राजाओं का निवास रहा। सरहद स्थित संरक्षित शिकारगाह के इलाके का महल बनाने के लिए चयन किया गया जो नए शहर का नियंत्रण स्रोत बना। आनन्दराम मिस्त्री नामक गृहशिल्पी जिसने नए शहर के लिए स्थान की तलाश की थी उस के सुझाव पर यह स्थान चुना गया। नगर प्रसाद कहे जाने वाले इस महल का निर्माण प्रसिद्ध नगर-नियोजक विद्याधर चक्रवर्ती की देखरेख में हुआ। जयपुर बनने से पहले बने इस महल के प्रधान निर्माणकर्ता महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय थे लेकिन महाराजा सवाई प्रताप सिंह और महाराजा सवाई रामसिंह द्वितीय का भी काफी कुछ योगदान रहा। सवाई जयसिंह द्वितीय ने अपने पुरखों के बगीचों युक्त सरहद के शिकारगाह की जमीन का उपयोग अपने स्थानीय रिहायशी क्वार्टरों के रूप में भी किया।

 इसलिए भवनों और बगीचे की स्थिति पूर्व परिभाषित नमूने के अनुसार रखी गई। यह सवाई जयसिंह की महानता ही थी, जिस के कारण विषम हालात में भी सुनियोजित और सुविधाजनक महल की रचना करने की योग्यता पास सका। नगर नियोजकों और गणितज्ञों के अनुसार खास बात यह है कि गढ़गणेश मंदिर के स्वास्तिक की सीधी रेखा, और चन्द्रमहल की सातवीं मंजिल मुकुट महल के गुम्बज के कलश समानान्तर 90 अक्षांस की सिधाई पर आते हैं। वहीं इस सीध में अल्बर्टहाल और मोती डूंगरी के कलश भी आते हैं। मुकुट महल (मंदिर) के बारे में यूरोपीय पर्यटक बीशोप हेवर सहित कई अन्य शैलानियों द्वारा किया गया जो उल्लेख मिलता है उससे सिद्ध होता है कि वर्तमान शक्ल में इस का निर्माण1825 ई से काफी पूर्व हो चुका था जब सवाई रामसिंह द्वितीय ने विशेषता वाली इस चोटी की मंजिल का निर्माण कराया था। इसके डागले (छत) का उपयोग सबसे ज्यादा सवाई रामसिंह द्वितीय ने ही किया जहां से वे पतंगबाजी का लुत्फ उठाते थे। ईसरलाट के अलावा सात मंजिल का चंद्रमहल शहर की दूसरी इमारत है जिसकी नजरों के नीचे पूरा जयपुर आ जाता है। 

एक ऐसा विहंगम नजारा जिसने अनूठी नगर रचना और भव्य स्थापत्य कला वाले इस मनोहर नगर के दिग्दर्शन हो जाते हैं। और इन सात मंजिली इमारत की सच्चाई यह भी है कि जहां ईसरलाट सदियों से उपेक्षित होता रहा है वहीं सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा निर्मित आलीशान चन्द्रमहल को सवाई प्रतापसिंह, सवाई रामसिंह द्वितीय, सवाई माधोसिंह द्वितीय और सवाई मानसिंह द्वितीय के समय में अपनी अपनी पसंदीदा सोच के साथ नई साज सज्जा दी ।
- रामस्वरूप सोनी
वरिष्ठ पत्रकार



 

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