मेडिकल-इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा साल में दो बार

Samachar Jagat | Friday, 13 Jul 2018 10:46:10 AM
Medical-engineering entrance examination twice a year

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जेमेन्स और नीट की परीक्षाएं अब साल में दो बार होगी। इसके साथ ही नेट, सीमैट और जीमैट परीक्षा अब कम्प्यूटर आधारित होगी। इन परिक्षाओं का आयोजन अब नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) करेगी। अब तक इन परीक्षाओं का आयोजन सीबीएसई करती थी। जेईई और नीट की तैयारी कर रहे देश के लाखों छात्रों के लिए यह घोषणा राहत देने वाली है। मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने पिछले सप्ताह शनिवार को प्रवेश परीक्षा सुधार से जुड़े इन बड़े फैसलों की घोषणा की। जावड़ेकर द्वारा की गई घोषणा के अनुसार मेडिकल और इंजीनियरिंग की ये प्रवेश परीक्षाएं अगले यानी 2019 के सत्र से साल में दो बार हुआ करेगी।

 इंजीनियरिंग के लिए टेस्ट (जेईई मेन) जनवरी और अप्रैल में होंगे, जबकि मेडिकल के लिए प्रवेश परीक्षा (नीट) फरवरी और मई में होंगे। जैसा कि पूर्व में कहा गया है, इन परीक्षाओं का संचालन एनटीए यानी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी करेगी और दोनों परीक्षाओं में कठिनाइयों का स्तर एक सा बनाए रखने की जिम्मेदारी भी उसी की होगी। यहां यह बता दें कि आज जब हर बड़े इम्हतान का पेपर लीक एक राष्ट्रीय आपदा का रूप ले चुका है, एक ही सत्र के लिए कई-कई दिन चलने वाली दो प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करना आसान नहीं होगा।

 लेकिन मेडिकल और इंजीनियरिंग में दाखिले की इच्छा रखने वाले युवाओं की दृष्टि से देखा जाए तो यह एक जरूरी फैसला है। इससे दो साल की तैयारी के बाद एक दिन खराब निकल जाने के खौफ से तत्काल राहत मिलेगी। अपनी तैयारी और मूड के हिसाब से अब वे एक या दूसरी परीक्षा में या फिर दोनों में बैठने का फैसला कर सकते हैं। देश में भले ही इंजीनियरिंग और मेडिकल की सीटें न बढ़ी हो, परीक्षार्थियों की संख्या में बड़ी कमी आने का भी कोई आसार न हो, फिर भी प्रवेशार्थियों को अपना प्रदर्शन सुधारने की उम्मीद जरूर मिलेगी। इन परीक्षाओं की तैयारी में कोचिंग की भूमिका पर भी शायद ही कोई असर पड़े। लेकिन कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि के जो युवा कोचिंगि जॉइन करने की स्थिति में नहीं होते, वे भी जनवरी-फरवरी के तजुर्बे का इस्तेमाल अप्रैल-मई वाली परीक्षा में करके अपनी संभावना सुधार सकते हैं।

 हालांकि बीच में उन्हें इंटरमीडियट का इम्हतान भी देना होगा, जिसका ढांचा बिल्कुल अलग होता है। मेडिकल-इंजीनियरिंग कॉलेजों के प्रबंधन के लिए भी यह फैसला इस मायने में राहतदेह कि इससे उन्हें कुछ बेहतर विद्यार्थी मिल सकते हैं। एक बार की परीक्षा में कुछ संभावना इस बात की भी हुआ करती थी कुछेक संयोगों की वजह से प्रवेश पा जाएं। इन कॉलेजों की ओर से जब तब यह भी शिकायत आती रही है कि कई छात्र दाखिला तो पा जाते हैं, लेकिन पढ़ाई की चुनौतियों का सामना नहीं कर पाते। दो परीक्षाओं की वजह एडमिशन का कट ऑफ थोड़ा ऊपर जा सकता है।

साफ है कि इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों को पहले के मुकाबले बेहतर विद्यार्थी मिलेंगे तो उन्हें बेहतरीन डॉक्टर या इंजीनियरिंग बनाने की उनकी जिम्मेदारी भी बढ़ जाएगी। इस क्रम में यह जरूर याद रखना चाहिए कि इंजीनियरिंग और मेडिकल की सरकारी सहायता वाली करीब 85 हजार सीटों के लिए करीब 25 लाख युवा आवेदन करते हैं। यह असंतुलन भी हमें देर-सबेर दूर करना ही होगा।
 

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