भौतिकता का अहंकार प्यार को खा जाता है

Samachar Jagat | Saturday, 04 Aug 2018 10:58:37 AM
The ego of materialism eats love

एक बार देवराज इन्द्र ने विश्वकर्मा को बुलाकर एक अत्यन्त विशाल और भव्य महल बनवाने के लिए कहा। वे चाहते थे कि नया महल ऐसा हो, जिसकी तुलना समस्त लोकों में नहीं हो। विश्वकर्मा ने ऐसे महल की योजना बनाई और उस पर काम शुरू कर दिया। लगातार काम करते-करते वर्षो बीत गए, लेकिन भवन पूरा नहीं हो सका। विश्वकर्मा ने कई बार इन्द्र से छुट्टी मांगी, लेकिन वे एक दिन की छुट्टी भी विश्वकर्मा को नहीं देते थे। इस बात से नाराज होकर विश्वकर्मा ब्रह्मा जी के पास गए और छुट्टी दिलवाने की बात कही। इस पर ब्रह्मा जी ने विश्वकर्मा को विष्णु भगवान के पास भेज दिया। एक दिन देवराज बनते हुए महल को देखने के लिए जा रहे थे। एक व्यक्ति इन्द्र के पीछे-पीछे जा रहा था। अचानक इन्द्र ने उस व्यक्ति को वहां देखकर बोला-‘तुम यहां क्यों आए हो, तुम कौन हो?’

उस व्यक्ति ने बहुत विनम्रता से इन्द्र से कहा- ‘हे राजन! आप क्रोधित न हों, आपके इस महल की खूबसूरती की चर्चा तीनों लोकों में हो रही है, इसलिए इस महल को देखने का लोभ मुझे यहां तक ले आया है।’ उस व्यक्ति से अपने महल की प्रशंसा सुनकर इन्द्र बहुत खुश हुए और बोले कि इस महल के प्रधान शिल्पी ये विश्वकर्मा है। इन्द्र से ऐसा सुनकर वह व्यक्ति आंखें फाड़ते हुए बोला- ‘एक अकेला विश्वकर्मा? मैं तो समझ रहा था कि बहुत सारे विश्वकर्मा इसे बनवा रहे होंगे।’ इन्द्र देव ने हंसते हुए कहा कि क्या विश्वकर्मा भी अनेक होते हैं क्या? वह व्यक्ति बोला- ‘देवराज! वेद कहते हैं, प्रत्येक ब्रह्माण्ड में अनेक प्रकार की सृष्टियां हैं और उन सृष्टियों में न जाने कितने ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र और विश्वकर्मा हैं, कोई नहीं जानता।

 उसी समय वहां तेजस्वी महाराज लोमश प्रकट हुए और बोले- ‘विधाता ने मुझे अमर बना दिया लेकिन इस अमरता को लेकर मैं क्या करू? अब तक न जाने कितने ही इन्द्र आए और चले गए। ऐसी निस्सार सृष्टि देखकर मैंने न कोई घर बनाया और न ही अन्य भौतिक चीजें बसाई।’ जब इन्द्र ने ऐसा सुना तो वे सकते में आ गए और उनका अहंकार चूर-चूर हो रहा था और उनके मुखश्री से निकल रहा था- ‘जो अमर है, उसका कोई घर नहीं, फिर मैं यह महल क्यों बनवा रहा हूं।’ फिर इन्द्र ने विश्वकर्मा जी से क्षमा याचना की और मेहनताना देकर छुट्टी स्वीकार की।

यहां इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हम अच्छे से अच्छा सा घर नहीं बनावाएं, अच्छे से रहें नहीं और नेक कमाई नहीं करें, सब कुछ करें, लेकिन इन नाशवान चीजों का अहंकार नहीं करें अगर ऐसा किया तो फिर गिरना तय है इसमें कोई दो राय नहीं है। अहंकार नहीं, सारी मानवता से प्यार करें, आपका जीवन प्रेममय और सुखमय हो जाएगा।

प्रेरणा बिन्दु:- 
किया अहंकार तो फिर
गिराए बिन गिर जाएगा
प्रेम जीवन सार से
बहुत कुछ कर जाएगा।
 



 

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