मतदाताओं को प्रत्याशियों की पृष्ठभूमि जानने का अधिकार

Samachar Jagat | Tuesday, 11 Sep 2018 01:08:26 PM
Voters have the right to know the background of candidates

सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने चुनावों में पारदर्शिता के पक्ष में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। पीठ ने कहा है कि मतदाताओं को उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि जानने का अधिकार है। कोर्ट की राय में चुनाव आयोग को यह कहा जा सकता है कि वह राजनीतिक दलों को आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे लोगों को टिकट ना देने का निर्देश दे। इन टिप्पणियों के बाद पीठ ने इस संबंध में कई याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रखा। सुप्रीम कोर्ट इस सवाल पर सुनवाई कर रहा है कि आपराधिक सुनवाई का सामना कर रहे किसी जनप्रतिनिधि को मामले में आरोप तय होने पर अयोग्य ठहराया जा सकता है या नहीं? 

फिलहाल जनप्रतिनिधियों को सजा होने के बाद उन पर चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगती है। मगर केंद्र ने कहा है कि न्यायपालिका को विधायिका के क्षेत्र में प्रवेश नहीं करना चाहिए, जिसका चुनावों में उम्मीदवारों की सहभागिता के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। अटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने पीठ से कहा ‘‘न्यायाधीशों की मंशा हास्यास्पद है। सवाल यह है कि क्या अदालत ऐसा कर सकती है। जवाब है-नहीं।’’ अटार्नी जनरल वेणुगोपाल पीठ ने इस सुझाव पर जवाब दे रहे थे कि क्या आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे लोग चुनाव लड़ने के लिए स्वतंत्र होंगे। 

अटार्नी जनरल ने कहा कि न्यायपालिका विधायिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं कर सकती है। उन्होंने दोष सिद्ध होने तक व्यक्ति को निर्दोष मानने की अवधारणा का जिक्र किया। कहा कि न्यायालय व्यक्ति के मत देने के अधिकार शर्त नहीं लगा सकता है। इसमें चुनाव लड़ने का अधिकार भी शामिल है। पीठ ने कहा कि उसकी मंशा विधायिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने का नहीं हो लेकिन मतदाताओं को प्रत्याशी की पृष्ठभूमि जानने का अधिकार है। 
पीठ ने पूछा कि क्या न्यायपालिका निर्वाचन आयोग से इस तरह की शर्त निर्धारित करने के लिए कह सकता है कि राजनीतिक दल चुनाव से पहले अपने सदस्यों की आपराधिक पृष्ठभूमि सार्वजनिक करें? मकसद यह है कि आम जनता को प्रत्याशियों और उनके आपराधिक अतीत के बारे में जानकारी मिल सके। यहां यह बता दें कि अदालत ने इससे पहले राजनीति के अपराधीकरण को सड़न बताया था। 

अब देखने की बात यह होगी क्या सुप्रीम कोर्ट केंद्र की आपत्तियों को नजरअंदाज करते हुए इस बारे में निर्वाचन आयोग को कोई दिशा-निर्देश जारी करता है। हालांकि ऐसा करना पारदर्शिता के हित में होगा, लेकिन इससे कार्यपालिका एवं न्यायपालिका में नया टकराव पैदा हो सकता है।
 



 

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