Mahashivratri 2021 : भगवान शिव के आभूषणों में से एक मां गंगा और सिर पर चंद्रमा धारण करने के पीछे ये है पौराणिक मान्यता, महाशिवरात्रि से पहले जान लें पूरी कथा

Samachar Jagat | Tuesday, 02 Mar 2021 12:35:36 PM
Mahashivratri 2021: This is the mythological belief behind the wearing of the mother Ganges and the moon on the head, one of the jewels of Lord Shiva, know the whole story before Mahashivratri

इंटरनेट डेस्क। इस वर्ष मार्च माह में हर दूसरे या तीसरे दिन पर्व और त्योहार पड़ रहे हैं। 11 मार्च को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाएगा। वैसे पंचांग के अनुसार, हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। लेकिन फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन को मनाने की सबसे विशेष मान्यता ये है कि इस दिन मां पार्वती और भगवान शिव का विवाह हुआ था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव के आभूषणों में से एक मां गंगा और मस्तक पर चंद्रमा धारण करने के पीछे क्या कारण है।

तो आइये आज आपको इसके पीछे की मान्यताओं के बारे में बताते हैं...

पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव के आभूषणों में से एक आभूषण मां गंगा भी हैं। पुराणों में ऐसी कथा प्रचलित है कि प्राचीन काल में भागीरथ एक प्रतापी राजा थे। उन्होंने अपने पूर्वजों को जीवन-मरण के दोष से मुक्त करने के लिए मां गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए कठोर तपस्या की। भागीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर आने को तैयार हो गईं। परन्तु मां गंगा ने भागीरथ से कहा कि यदि वे स्वर्ग से सीधे पृथ्वी पर गिरेंगी तो पृथ्वी उनका वेग सहन नहीं कर पायेगी और पृथ्वी नष्ट हो जायेगी। यह बात सुनकर भागीरथ बहुत चिंतित हुए। मां गंगा को यह अभिमान भी था कि उनका वेग कोई सहन नहीं कर पायेगा।

चिंता के निदान हेतु भागीरथ ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। भागीरथ की कठोर तपस्या से भगवान शिव अति प्रसन्न हुए और वर मांगने को कहा। तब भागीरथ ने अपना सारा मनोरथ भोलेनाथ से कहा। गंगा जैसे ही स्वर्ग से नीचे पृथ्वी पर आने लगी वैसे ही भगवान शिव ने अपनी जटा में उन्हें कैद कर लिया।  तब वह छटपटाने लगी और शिव से माफ़ी मांगी। तब शिव ने उन्हें एक पोखरे में छोड़ा। जहां से वे सात धाराओं में विभाजित हुईं।

वहीं एक दूसरी कथा के अनुसार, समुद्र मंथन से निकले विष से सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने विष को पी लिया था. इससे भगवान शिव का शरीर गर्म हो गया। तब चंद्रमा ने  भगवान शिव को शीतलता प्रदान करने के लिए उनके सिर पर विराज होने की प्रार्थना की। लेकिन शिव ने चंद्रमा के आग्रह को नहीं माना। लेकिन जब भगवान शंकर विष के तीव्र प्रभाव को सहन नहीं कर पाये तब देवताओं ने सिर पर चंद्रमा को धारण करने का निवेदन किया। देवताओं की आग्रह को स्वीकार करते हुए जब शंकर भगवान ने चंद्रमा को धारण किया। तब विष के प्रभाव की तीव्रता धीरे –धीरे कम होने लगी। तभी से भगवान शिव के सिर पर चंद्रमा विराजमान है। 



 

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