तम्बाकू और होंठ-मुंह-गले के कैंसर

Samachar Jagat | Wednesday, 23 Nov 2016 03:39:49 PM
तम्बाकू और होंठ-मुंह-गले के कैंसर

विश्व सिर-गला केन्सर दिवस को सर्वप्रथम न्यूयॉर्क में 27 जुलाई 2014 को अंतर्राष्ट्रीय फेडरेशन ऑफ़ हेड एंड नैक ऑन्कोलॉजी सोसाइटीज के पाँचवे वैश्विक सम्मलेन में स्थापित किया गया (http://www.ifhnos.org/world-cancer-day). इसे विश्व के 45 राष्ट्रों की 52 हेड एंड नैक केन्सर सोसाइटीज का समर्थन प्राप्त है. इस दिवस के दो मुख्य उद्देश्य हैं:

1.    स्वास्थ्य सेवा तंत्र को मजबूती देने हेतु समर्थन प्रदान करना और सिर-गले  (होंठ, मुँह, गला और गर्दन) के केन्सरों की जागरूकता, खतरों, रोकथाम और शीघ्र निदान हेतु सामाजिक तरीकों को प्रारम्भ करना; और,
2.    निरंतर मेडिकल शिक्षा कार्यक्रमों के द्वारा चिकित्सकों को शिक्षित कर उनकी दक्षता और क्षमता को बढाना.  

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वैश्विक सिर-गले के स्क्वेमस कोशिका केन्सरों से प्रतिवर्ष 5,00,000 लोग पीड़ित होते हैं और 2,00,000 इन्हीं केन्सरों के कारण मर जाते हैं. ये केन्सर अपेक्षाकृत कम और उत्पादक आयु में होते हैं, अतः इनके द्वारा हुई मृत्युओं और विकलांगता को रोका जाना आवश्यक है और ऐसा किया भी जा सकता है.

हर वर्ष लगभग 3,00,000 व्यक्ति होंठ-मुँह के केन्सर से पीड़ित होते हैं और ~1,50,000 इनसे मर जाते हैं. पुरुष में बहुलता से पाया जाने वाला यह केन्सर विकासशील राष्ट्रों में अधिक होता है. क्षेत्रीय विविधता के सन्दर्भ में, दक्षिण, और दक्षिण-पूर्वी एशिया में होंठ-मुँह के केन्सरों की दर बहुत अधिक है. इस दिवस का महत्व भारतवर्ष के लिए सबसे अधिक है क्योंकि सभी केन्सरों में इनकी दर ~9.4% है और इनमें से ~50% निदान के पहले वर्ष में रोग से मर जाते हैं- ~50,000. इसीलिए, वैश्विक स्तर पर, मधुमेह के समान, भारत मुँह के केन्सरों की राजधानी के रूप भी में कुख्यात है. यह भी दुखद है कि पुरुषों और महिलाओं में समान दर से पाये जाने वाले ये केन्सर अपेक्षाकृत छोटी आयु में पाए जाने लगे हैं.  

इन केन्सरों की रोकथाम हेतु इनके कारकों व इनके शीघ्र निदान हेतु प्रारंभिक लक्षणों की सूचि लम्बी है- पाठक इसकी जानकारी अन्य स्त्रोतों से प्राप्त कर सकते हैं (http://www.ahns2014.org/video-replay/oral-cancer-awareness-early-detection-prevention/).
हमारी तम्बाकू-नियंत्रण मुहीम के अंतर्गत यह जान लेना उपयोगी होगा कि इनमें से ~50% धुआँरहित चबाने वाली तम्बाकू के उपभोग से होते हैं.

इस तम्बाकू के बारे में पूर्व में भी इस श्रंखला में जानकारी दी गयी थी जो कि इसके प्रादेशिक परिपेक्ष्य और नियंत्रण के सन्दर्भ में थी. अतः यह आवश्यक है कि इसके राष्ट्रीय स्तर पर किये जाने वाले प्रभावकारी नियंत्रक कदमों की जानकारी भी ले ली जाये. इसलिए भी धुआँरहित (चबाने वाली) तम्बाकू की विभिन्न किस्मों में निकोटीन, मुक्त-निकोटीन और केन्सरकारकों की मात्रा बहुत अधिक होती है. इनका विषैलापन तम्बाकू के प्रकार/जाति, उत्पादन की परिस्थितियों (मिट्टी में नाइट्रेट और धातुओं की मात्रा), सुखाने के तरीके (हवा- अथवा आग- के उपयोग से), प्रोसेसिंग (पास्चुरिकरण अथवा फर्मेंटेशन), उत्पादन तरीकों (सुपारी, चुना, सुगन्धित पदार्थों, इत्यादि, के मिश्रण) और संग्रहण के तरीकों पर निर्भर करता है.

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साथ ही, तम्बाकू अथवा इनके फर्मेंटेशन में सूक्ष्म जीवाणुओं (उदाहरणार्थ, बैक्टीरिया, फफूंदी) की उपस्थिति भी कुछ केन्सरकारकों और विषों की मात्रा को बढ़ा देती है. अतः आग-से-सुखाने की प्रक्रिया-, सूक्ष्म जीवाणुओं से संक्रमण-, फर्मेंटेशन और सुपारी, इत्यादि का मिश्रण- को कम करने से या पूरी तरह समाप्त कर देने से, और संग्रहण के तरीकों में सुधार ला कर केन्सरकारकों और विषों की मात्राओं को घटाया जा सकता है. इस तरह से धुआँरहित चबाने वाली तम्बाकूओं में से निकोटीन की मात्रा में कमी लायी जा सकेगी और तम्बाकू की व्यसनशीलता को घटाया जा सकेगा.

साथ ही इन धुआँरहित चबाने वाली तम्बाकूओं की दरों पर प्रभावी नियंत्रण के साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुझाये अधिकतम कर लगा- कर को मूल्य सूचकांक से जोड़ना और कर-चोरी रोकना आवश्यक है. इनकी विभिन्न नित नए ब्रांडों का व्यापकता से  विश्लेषण (Analysis) और विनियम (Regulation) व विपणन (Marketing), इत्यादि, की नीतियों और तरीकों के प्रति सजगता, प्रभावी सुधार और कड़ाई से पालना भी आवश्यक है. इसके साथ तम्बाकू छोड़ने की सर्वत्र आसान उपलब्धता के महत्व को कम नहीं आँका जा सकता है. ऐसा करके ही तम्बाकूजनित होंठ-मुँह-गले के केन्सरों के रोकथाम और नियंत्रण पर प्रत्याशित सफलता पायी जा सकती है.       

लेखन-

डॉ. राकेश गुप्ता, अध्यक्ष, राजस्थान केन्सर फाउंडेशन और वैश्विक परामर्शदाता, गैर-संक्रामक रोग नियंत्रण (केन्सर और तम्बाकू).

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