प्रधानमंत्री ने 50 दिन ही तो मांगे हैं, उनका साथ दीजिए

Samachar Jagat | Monday, 28 Nov 2016 02:38:30 PM
प्रधानमंत्री ने 50 दिन ही तो मांगे हैं, उनका साथ दीजिए

केंद्र सरकार ने कालेधन पर रोक लगाने के लिये 500 व 1000 के नोट को बंद करने का जो साहसिक निर्णय लिया है उसे लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया देशभर से मिल रही है। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है कि सरकार के इस निर्णय से कालाधन, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, अवैध व्यापार, ड्रग्स कारोबार और जाली करेंसी पर रोक लगेगी। नयी व्यवस्था लागू होने से देशवासियों को चंद परेशानियों से दो-चार होना पड़ रहा है।

 बावजूद इसके आम देशवासी सरकार के निर्णय से प्रसन्न है। वही कुछ लोग इस निर्णय के विरोध में अनर्गल बयानबाजी, अफवाह फैलाकर सरकार की छवि धूमिल करने की कोशिशों में जुटे हैं। सवाल यह है कि इस फैसले से निजी तौर पर प्रधानमंत्री या सरकार को क्या कोई लाभ मिलने वाला है। या फिर सरकार या प्रधानमंत्री का कोई निजी स्वार्थ सधने वाला है।

 असल में इस कदम से आने वाले समय में देश और देशवासियों को क्या भला होगा, यह समझने और जानने की बजाय अधकचरी जानकारी के आधार पर सरकार के फैसले को गर्म पानी पी-पीकर कोसने वाले कम नहीं हैं। यही चंद लोग देश की आम जनता को बरगलाने और अफवाह फैलाने का काम कर रहे हैं। 500-1000 रुपये के बड़े नोट बंद होने से मची अफरातफरी पर काफी कुछ नियंत्रण हो गया है परन्तु अभी भी आम जनता को हो रही व्यवहारिक परेशानियां तकरीबन वैसी ही हैं।

 इलाज, विवाह और व्यापार के सिलसिले में बाहर गए लोगों के अलावा रेलों में सफर कर रहे यात्रियों को हुई अकल्पनीय परेशानियों के किस्से नोटबंदी का नकारात्मक पक्ष हैं। गत दिवस बैंक खुलते ही जिस तरह की भीड़ उमड़ी वह भी प्रधानमंत्री के फैसले पर सवाल उत्पन्न करने वाली रही। बावजूद इसके यदि बड़े नोट बंद करने के निर्णय को अधिकतर लोगों ने सराहा तो उसकी वजह जैसा प्रधानमंत्री ने कहा आम भारतीय का ईमानदार होना है। काले धन तथा नकली नोटों की समस्या से निबटने के लिये की गई ये कार्रवाई निश्चित रूप से राष्ट्रहित में जरूरी हो चली थी क्योंकि काले धन के रूप में संचालित समानांतर अर्थव्यवस्था ने प्रगति की राह में तो गति अवरोधक लगाए ही महंगाई भी आसमान पर पहुंचा दी थी। 

उस दृष्टि से नरेन्द्र मोदी की यह आर्थिक सर्जिकल स्ट्राइक एक कड़वी दवा या इंजेक्शन लगने से होने वाले कष्ट की तरह ही है जो अंतत: आराम पहुंचाएगा किन्तु मात्र इतना करने से ही स्थिति पूरी तरह सुधर जाएगी तथा रामराज आ जाएगा ये सोचना या दावा करना गलत है। वास्तव में आजादी के बाद से लगातार फल-फूल रहे भ्रष्ट तंत्र को खत्म करने के लिये ऐसे कई और उपाय होने बाकी हैं, जिसकी ओर प्रधानमंत्री ने इशारा किया भी है। पिछले दिनों जब किसी ने अफवाह फैला दी कि नमक की कमी हो गई है।

 बस फिर क्या था लोग नमक खरीदने दौड़ पड़े। देश के कई शहरों में 100 और 400 रुपये प्रति किलो तक वह बिक गया। दुकानों में रखे नमक के पैकेट देखते-देखते खत्म हो गये। 500-1000 रुपये के नोट का चक्कर छोड़ लोग-बाग नमक के लिये धक्का-मुक्की में जुट गए। जब तक मीडिया तथा सरकार स्पष्ट करते कि नमक की कोई कमी नहीं है तब तक तो अफवाह तंत्र अपना काम कर चुका था। 

कुछ घंटों की अफरातफरी के बाद हालांकि मारामारी खत्म होकर हालात सामान्य बन गए परन्तु थोड़ी देर के तमाशे में ही लाखों-करोड़ों का खेल हो गया। नमक की कमी यदि होती तो उसके संकेत पहले से कुछ न कुछ तो आते परन्तु बड़े-नोट बंद होना जैसा माहौल बनाकर आम जनता को डरा दिया गया।

 अच्छा हुआ बात लंबी नहीं भखची परन्तु जो हुआ उससे एक बात तो साफ हो ही गई कि समाज विरोधी तत्वों के हौसले किस तरह बुलंद हैं। ये तो अच्छा हुआ स्थिति शीघ्र ही संभल गई वरना नमक के फेर में न जाने कौन सी मुसीबत खड़ी हो जाती। सरकार के लिये हालांकि पता लगाना कठिन है कि इसके पीछे किसका दिमाग था परन्तु जनता का भी ये फर्ज बनता है कि कौवा कान ले गया की चिल्लाहट सुनते ही अपना कान छूकर देखने की बजाय ठंडे दिमाग से विचार कर कोई निर्णय लें वरना अभी नमक ने दौड़ाया कल कोई अन्य चीज अफरातफरी मचा देगी। 

वास्तव में केवल सरकार द्वारा नियम, कानून, प्राधिकरण, अधिनियम, अभियान या कार्यक्रमों को बनाना काफी नहीं है, वास्तविकता में सभी गैर-कानूनी गतिविधियों से मुक्त होने के लिये इन सभी का प्रत्येक भारतीय नागरिकों के द्वारा कड़ाई से अनुसरण किया जाना चाहिये। क्योंकि कोई भी राष्ट्र धन व शक्ति के बल से नहीं, बल्कि श्रेष्ठ चरित्रवान नागरिकों के बल पर महान बनता है। एक अच्छा नागरिक देश को शक्ति संपन्न, समृद्ध और संगठित बनाता है। 

देश की आजादी के बाद, अमीर लोग और राजनेता केवल अपने खुद के विकास में लग गये न कि देश के विकास में। ये सत्य है कि हम ब्रिटिश शासन से आजाद हो गये हैं हालांकि, लालच, अपराध, भ्रष्टाचार, गैर-जिम्मेदारी, सामाजिक मुद्दों, बाल श्रम, गरीबी, क्रूरता, आतंकवाद, कन्या भ्रूण-हत्या, भलग-असमानता, दहेज-मृत्यु, सामूहिक दुष्कर्म और अन्य गैर-कानूनी गतिविधियों से आज-तक आजाद नहीं हुये हैं। भारत एक धार्मिक, सांस्कृतिक और परंपरागत देश है और विविधता में एकता के लिये प्रसिद्ध है।

 हालांकि, इसे विकास के लिये स्वच्छ, भ्रष्टाचार, सामाजिक संघर्षों, महिलाओं के खिलाफ अपराधों, गरीबी, प्रदूषण, ग्लोबल वॉर्मिग आदि के अन्त के लिये अपने नागरिकों के और अधिक प्रयासों की आवश्यकता हैं। लोगों को सरकार पर चिल्लाने और दोषी ठहराने के स्थान पर देश के प्रति अपने कत्र्तव्यों को समझना चाहिये। देश की वृद्धि एवं विकास के लिये सभी व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार हैं।

 लोगों को लाओं तुज के प्रसिद्ध कथन, ‘‘हजारों कोसों की यात्रा एक कदम से शुरू होती है’’ को कभी नहीं भूलना चाहिये। सभी को अपने मौलिक कत्र्तव्यों के बारे में जानकारी रखनी चाहिये और उन्हें नजरअंदाज किये बिना अनुकरण करना चाहिये। देश के लिये अपनी जिम्मेदारियों को निभाने की याद दिलाने के लिये कोई विशेष समय नहीं होता, हालांकि ये प्रत्येक भारतीय नागरिक का जन्मसिद्ध अधिकार है कि वो देश के प्रति अपने कर्तव्यों को समझे और आवश्यकता के अनुसार उनका निर्वाह या निष्पादन अपनी दैनिक दिनचर्या में शामिल करे। 

एक देश पिछड़ा, गरीब या विकासशील है तो सब-कुछ उसके नागरिकों पर निर्भर करता है तब तो और भी विशेष रूप से जब वो देश एक प्रजातांत्रिक देश हो। देश और नागरिक दोनों परस्पर एक दूसरे पर आश्रित हैं। कोई भी देश और नागरिक तभी गौरवान्वित हो सकता है जब एक नागरिक सच्चे अर्थों में देश के लिए अपने कत्र्तव्य और उत्तरदायित्व का पूर्ण रूप से निर्वाह करे, जिससे देश भी ऐसे नागरिक पर गर्व कर सके।

हम चूंकि बातचीत करते समय आमतौर पर बेहद आदर्शवादी होते हैं। इतनी बड़ी-बड़ी बातें करते हैं जिनका आमतौर पर हमारी  जिंदगी में कोई महत्व नहीं होता। ऐसे समय में हम प्रधानमंत्री को क्या करना चाहिए और क्या नहीं इसकी तो फेहरिस्त बनाते दिखते हैं, लेकिन वास्तव में हम ऐसे समय अपने आपके लिए कोई लिस्ट नहीं बनाते कि हमें अपनी फर्ज आदयगी के लिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए? वैसे भी कोई देश महज शासन और प्रशासन की बदौलत महान नहीं बनता। हम अकसर देश की कमियों को ही उजागर करते हैं।

 मगर यह कभी नहीं सोचते कि हमारे देश ने हमें क्या-क्या दिया। हम कमियां निकालने में महारत हासिल कर रहे हैं। हम यह क्यों नहीं देख पाते कि हमारे देश जैसा कोई देश ही नहीं है। किसी देश को महान उसके नागरिक अपने सिविक सेंस या नागरिक गुण के जरिए बनाते हैं। जरूरी नहीं कि हम बड़े-बड़े आदर्शों की बात करें और उन्हीं के जरिए देश की सेवा करने की सोचें। हम छोटे-छोटे फर्जों से भी देश के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। प्रधानमंत्री ने देशवासियों से नोटबंदी मामले में 50 दिन का वक्त मांगा है। उम्मीद है एक पारदर्शी व्यवस्था, विकसित राष्ट्र और उज्ज्वल भविष्य के लिये देशवासी प्रधानमंत्री और सरकार का साथ देंगे।

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