जयपुर की फुटपाथों पर भटक रहा है, करोड़पति वृद्ध

Samachar Jagat | Wednesday, 25 May 2022 10:57:11 AM
Millionaire old man wandering on the footpaths of Jaipur

जयपुर की फुटपाथ पर गरीब और मजबूर लोग तो बेशक भटकते दिखाई दे जाते है, मगर इन दिनों अजीब सा सीन देखने को मिल रहा है। इस वाकिए की खास बात यह है कि फटेहाल अवस्था में दिखाई देने वाला एक सख्स अपने आप को करोड़पति खानदान का बताता है। उनके परिवार में दो नजदीकी रिश्तेदार दिल्ली के एक कोर्ट में जज है। दूसरा जो कि दोयता है, उसका भी कुछ समय पहले ज्यूडिशरी में सलेक्सन हो चुका है। फिलहाल उसकी ट्रेनिंग चल रही है।

वृद्ध बाबा का ससुराल भी किसी से कम नहीं है। नई दिल्ली में दो पैट्रोल पम्प है। दो भतीजे सर्राफे का काम कर रहे है। इन दोनोंे के दो अलग- अलग शो रूम चल रहे हैं।  विजय कुमार की बातें विचित्र लगती है। भला जब, उसके खानदान मंें कई नजदीकी रिश्तेदार खूब अच्छा खासा कमाते है। इसके बाद भी उसकी इस हालत का कारण क्या रहा, । बात समझमें नहीं आती है। कहने को अपना दुखड़ा वह विस्तार से सुनाता है। मगर अनेक सवालांें के जवाब उसके पास भी नहीं है। जयपुर आने के कारणों को लेकर वह बताने लगता है कि जयपुर की भगवान महावीर विकलांग समिति क ी बड़ी बड़ी बातें सुनी थी। वहां रह कर कुछ दिन वह काट सकता है।


विजय बाबू को और कुछ नहीं चाहिए, राजस्थान सरकार की स्वास्थ्य योजना से जुड़ कर अपना उपचार करवाना चाहता है। मगर वहां अप्रोच नहीं बैठ पा रही है। एक पांव को लकवा हो जाने पर उसे चलने- फिरने में तकलीफ होती है। जमीन से घिसट कर बड़ी मुश्किल से अपना जरूरी काम कर पाता है। विजय कुमार से मुलाकात जे.एल.एन. मार्ग पर राम निवास बाग के गेट के बाहर हुई थी। वहीं निकट ही कबूतरों को चुग्गा डालने का छोटा मैदान है। दो महिलाए पक्षियों के लिए ज्वार और बाजरा बेचती है। दो- तीन बुजुर्ग भी वहां अक्सर बैठ कर खांें- खों करते रहते है। इनके भी आगे पीछे कोई नहीं है।


विजय कुमार की पर्सनल्टी अच्छी है। लम्बा कद है। बढती उम्र के चलते चेहरे पर झुंर्रिया गहरा गई है। एक आंख में मोतिया बिंद भी है। चिकित्सक सर्जरी की सलाह दे चुके है, मगर विजय कुमार के पास ना तो पैसे नहीं है। फिर ऑपरेशन के बाद कम से कम एक व्यक्ति संहालने को चाहिए। इस तरह का सेवा भावी नहीं खोज पाया है। ओढने - बिछाने को उसके पास कुछ भी तो नहीं है। चौड़े सीने पर सफेद रंग मैला और पुराना कुर्ता पहने रहता है। पायजामे की जगह सूती धोती पहनना उसकी मजबूरी है। पांवों मंे रबर की पुरानी चप्पले पहना करता है। साइज में चप्पलें छोटी होने पर उसके पांवों की बिवाई में गहरी दरारें पड़ चुकी है।


 इलाज को लेकर खासी बातें सुनाने के बाद , अपने परिचय को लेकर छोटा सा जवाब उसके पास रहता है। बेबस बाबा बताता है कि वह यूपी का रहने वाला है। सात बेटियों का पिता है। जिनमें बड़ी बेटी हीे पिता को अपने संग रखा करती थी। मगर कुछ साल पहले कोई हादसे में उसका देहांत हो गया था। इस पर मन उछट गया था । हालांकी उसके दोयते- दोयतियां नहीं चाहती थी कि नाना उनसे दूर रहे। मगर जवांई जी के व्यवहार में परिवर्तन आने पर उसे अपना ठिकाना बदलना पड़ा।


बेबस वृद्ध कहता है कि उसके तीन पोते भी है। जिनके अपने- अपने कारोबार है। मगर रहते एक संग ही है। घर छोड़ने की बात पर वह कई तरह के सवाल खड़े कर देता है। पहला यह कि उसकी प‘ि अच्छे पैसे वाले परिवार से थी। संयुक्त परिवार उसे पसंद नहीं था। किसी ना किसी बात को लेकर उनसे खटपट चलती रहती थी। इस पर घर का माहौल बनाव भरा हो गया था। इसी समस्या के निदान के तौर पर अपने पति की कमाई से गांव में ही उसने एक छोटा सा मकान खरीद लिया था, मगर कोई छ: माह पहले बारीश में वह ढह गया। खुद का कारोबार भी चला गया। कोरोना काल में कई माह तक लॉकडाउन लग जाने पर, उसकी जमा पूंजी खत्म हो गई। फिर बीबी का देहांत भी हो गया था। वह खुद क्या करता, दो -दो बीमारियां जो पाली हुई थी ।

पैसों के अभाव में अपना ईलाज ठीक से नहीं करवा पा रहा था। एसएमएस के चिकित्सकोंे का कहना था कि कई सारी बीमारियों के चलते उसे कुछ दिन अस्पताल में रहना होगा। मगर इसके लिए वह तैयार नहींे था। किसी तरह आउड डोर में जाकर सरकारी दवाएं ले आता है। मगर दवाईयों के साथ खुराक भी तो चाहिए। विजय बाबू की हालत दयनीय हो चुकी है। पेट भरनने का एक मात्र साधन के तौर पर ,जे.के. लॉन अस्पताल में समाज सेवियों की निशुल्क भोजन वितरण करने वाली गाड़ी आती है। इसकी क्वालिटी ठीक- ठाक है। अच्छी होने पर उसी से अपना पेट भर रहा है। रात काटने को उसकेे पास बिस्तर नहींे है। अस्पताल के एक नम्बर गेट से प्रवेश करते ही, साइकिल स्टेण्ड के निकट ही लम्बा चबूतरा बना हुआ है, उसकी पर ल्ोट कर नींद काट रहा है।


विजय कुमार दिगम्बर जैन परिवार से संबंध रखता है। मगर जयपुर के जैन समाज में उसकी अप्रोच नहीं है। गरीबी के चलते उसके ·ान - नित्यकर्म की कोई ठीेक- ठाक सी व्यवस्था ना होने पर बड़ी परेशानी से अपने दिन काट रहा है। विजय बाबू चाहता है कि जयपुर के जैन समाज की उसे मदद मिल जाए। मगर अभी तक उसे इसमें सफलता नहीं मिल सकी है।



 

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