लघु वित्तीय संस्थानों का दम घुटा, एनबीएफसी की बल्ले-बल्ले

Samachar Jagat | Wednesday, 23 Nov 2016 02:53:21 PM
लघु वित्तीय संस्थानों का दम घुटा, एनबीएफसी की बल्ले-बल्ले

मुंबई। पांच सौ और एक हजार रुपये के पुराने नोट अमान्य कर दिये जाने से लघु वित्तीय संस्थानों (एमएफआई)का संग्रह घट गया है जिससे उन्हें पूंजी की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। वहीं, ऋण उठाव में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की हिस्सेदारी बढऩे की उम्मीद है।

साख निर्धारक एवं निवेश सलाह एजेंसी इक्रा ने आज अपने ग्राहकों को जारी एलर्ट में कहा, पुराने नोट बंद करने के सरकार के फैसले से एमएफआई के संग्रह में गिरावट दर्ज की गयी है। अधिकतर कंपनियों का संग्रह 30 से 60 प्रतिशत घट गया। उसने कहा कि नकदी की कमी के कारण अधिकतर कंपनियों ने अपने ग्राहकों को भुगतान के लिए तीन दिन से तीन सप्ताह तक का अतिरिक्त समय दिया है ताकि वे नये नोटों की व्यवस्था कर सकें। साथ ही वे संग्रह के अन्य माध्यम जैसे चेक, डिमांड ड्राफ्ट तथा ऑनलाइन ट्रांसफर के विकल्प भी तलाश रही हैं। 

संग्रह कम होने तथा परिचालन संबंधी दिक्कतों के कारण नये ऋण देने का काम भी बाधित हो रहा है। इक्रा के अनुसार, नोटबंदी से बड़े एमएफआई के मुकाबले छोटे एमएफआई को ज्यादा नुकसान हुआ है क्योंकि वैकल्पिक माध्यमों से भुगतान स्वीकार करने के लिए उनके पास पर्याप्त ढांचा नहीं है। इससे कुछ संस्थानों के समक्ष तरलता की समस्या पैदा हो सकती है। इसके बावजूद दो-तीन महीने तक नये ऋण देने के लिए उनके पास पूंजी है। लेकिन, यदि उनका संग्रह एक तिमाही के बाद भी कम बना रहा तो उन्हें पूँजी के नये स्रोतों की तलाश करनी पड़ेगी। 

साख एजेंसी का कहना है कि यदि जमीनी स्तर पर स्थिति में सुधार नहीं होता है तो अगले तीन से छह महीने के दौरान एमएफआई के सामने तरलता तथा परिसंपत्ति की गुणवत्ता की समस्या पैदा हो सकती है। इससे उनकी क्रेडिट रेभटग पर दबाव बढ़ेगा। 

एक अन्य साख निर्धारक एवं बाजार अध्ययन एजेंसी क्रिसिल ने आज कहा क्रिसिल का पूर्वानुमान है कि दिये गये कुल ऋणों में एनबीएफसी की हिस्सेदारी अगले तीन वित्त वर्षों में तीन प्रतिशत बढक़र 17.6 प्रतिशत पर पहुँच जायेगी। पिछले पाँच साल में उनकी बाजार हिस्सेदारी तीन फीसदी बढ़ी है तथा अगले तीन साल में एक बार और इसमें तीन प्रतिशत का इजाफा होगा। ऐसा प्रौद्योगिकी तथा परिचालन में नवाचार पर निवेश में पहल के कारण होगा। इसके दम पर वे निजी बैंकों से मिल रही प्रतिस्पद्र्धा का मुकाबला कर सकेंगे। 

नोटबंदी के बाद बड़ी मात्रा में बैंकों में जमा हो रही पूँजी के बावजूद क्रिसिल का कहना है कि परिसंपत्ति की गुणवत्ता को लेकर चुनौती का सामना कर रहे निजी बैंक अब भी फूँक-फूँककर ऋण दे रहे हैं। दूसरी ओर नवाचारी उत्पादों के कारण एनबीएफसी का ऋण उठाव ज्यादा तेजी से बढ़ेगा। वर्ष 2012 में उनके ऋण उठाव में 16 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाले उत्पादों की हिस्सेदारी बढक़र वर्ष 2019 तक 40 फीसदी हो जायेगी। उसने कहा कि धीरे-धीरे सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को दिये जाने वाले अपने ऋण में एनबीएफसी बढ़ोतरी करेंगे।                 -एजेंसी

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