मधुर वाणी बोलो, दूसरों के प्रति प्रेमभाव रखो : मुनिश्री

Samachar Jagat | Saturday, 04 Aug 2018 11:00:43 AM
Speak sweet words, keep affection for others: Munishri

देवली। संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्या सागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि पुंगव श्री सुधा सागर जी ने कहा कि मुर्खों से कभी तर्क मत कीजिये, क्योंकि पहले वे आपको अपने स्तर पर लाएंगे और फिर अपने ओछेपन से आपकी धुलाई कर देंगे।

मुनिश्री ने उक्त विचार शुक्रवार को श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र ‘सुदर्शनोदय’ तीर्थ आवां में धर्मसभा में व्यक्त किए। मुनिश्री ने कहा कि इंसान जन्म के दो वर्ष बाद बोलना सीख जाता है लेकिन बोलना क्या है? यह सीखने में पूरा जन्म लग जाता है। शब्द तो मन से निकलते हैं दिमाग से तो ‘मतलब’ निकलते हैं। एक बेहतरीन इंसान अपनी जुबान से ही पहचाना जाता है वरना अच्छी बातें तो दीवारों पर भी लिखी होती है। इसी प्रकार आपने इस संसार मे देखा होगा कि वाणी में भी अजीब शक्ति होती है। कड़वा बोलने वाले का शहद भी नहीं बिकता और मीठा बोलने वाले की मिर्ची भी बिक जाती है।

मुनिश्री ने कहा कि हम किसी का भला न कर सकें तो कम से कम उसके भले के बारे में सोच सकते हैं। 
इसमें तो हमारा कुछ नहीं जाता है। हमारे मन में जैसे भाव दूसरे के लिए होंगे, वैसे ही हमारे साथ होगा, इसलिए दूसरों के बारे में मन में अच्छे भाव होने चाहिए। इसलिए किसी का भला न कर सको तो कम से कम किसी का बूरा तो न करो। मनुष्य जीवन में हमेशा भला सोचना चाहिए ताकि हमारा लाभ हो। भला का उल्टा पढ़ेंगे तो लाभ होगा।
मंत्रों में अपूर्व शक्ति होती है 

मुनिश्री ने कहा कि मंत्रों में अपूर्व शक्ति होती है। मंत्रों के माध्यम से आप शब्दों के प्रभाव देख सकते हैं। 
मंत्रों के माध्यम से आप अलौकिक निधियां प्राप्त कर लेते हैं पर आपने मंत्रों की महिमा को समझा नहीं है। मंत्र वह सुरक्षा कवच है जो मन की सुरक्षा करता है। श्रद्घा भक्ति सहित जो मंत्र का जाप करते हैं वह अपने जीवन में मानसिक प्रदूषण को दूर कर देते हैं। निरंकुश मन को अंकुश करने वाला मंत्र ही है। मंत्र को जपते समय मन अगर स्थित नहीं है तो वह मंत्र उतने कार्यकारी नहीं होते मन की स्थिरता के साथ अगर आप जाप करते है तो वह मंत्र आत्म-साक्षात्कार कराने में माध्यम बनते है। मन के अनेक कार्य है भचतन, मनन, स्मृति आदि। आज का व्यक्ति अतीत और अनागता में जी रहा है वर्तमान में बहुत कम लोग जीते है। या तो व्यक्ति अतीत और अनागत में जी रहा है वर्तमान में बहुत कम लोग जीते है या तो व्यक्ति भूत की स्मृतियों में उलझ जाता है या भविष्य की कल्पनाओं में उलझ जाता है।

सच बोलना व सच का साथ देना ही सबसे बड़ा धर्म है 
मनुष्य को काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्षा, द्वेष से बचना चाहिए। इनमें से अगर कोई भी मनुष्य पर हावी हो जाए तो मनुष्य भगवान को कभी भी प्राप्त नहीं कर सकता। अगर मनुष्य को भगवान की शरण में जाना है तो इन बुराइयों को अपने मन से निकालना होगा। बिना स्वार्थ के की गई सेवा व भक्ति का फल शीघ्र ही मिलता है। इसलिए मनुष्य को बिना स्वार्थ के भक्ति करनी चाहिए। भगवान भी अपने भक्त का हर मुश्किल समय में साथ देते हैं और उसे मुश्किल से निकालते हैं। 

अगर कोई मुसीबत आती है तो उससे घबराएं नहीं, बल्कि डटकर उसका सामना करें और भगवान पर विश्वास बनाए रखें। मुनिश्री ने कहा कि व्यक्ति को हमेशा सच व धर्म के रास्ते पर चलना चाहिए। असल में सच बोलना व सच का साथ देना ही सबसे बड़ा धर्म है।

 उन्होंने कहा कि जब बच्चा पैदा होता है, तब वह अपना पिछला भाग्य साथ लाता है। जैसा उसने पूर्व भाव में कर्म किया है, उसे वैसा ही फल मिलता है। जीव जैसा कर्म कर रहा है वैसा ही उसे आने वाले समय में फल भोगना पड़ेगा। जब समय खराब होता है तो अपने भी मुंह फेर लेते हैं। इसीलिए सम्यक भाव से जीवन यापन करना चाहिए। समिति अध्यक्ष नेमीचन्द जैन पवन जैन, आशीष जैन, श्रवण कोठारी ने बताया कि शनिवार को प्रात: 7:30 बजे से अभिषेक एवं शांतिधारा होगी। प्रात: 9 बजे मुनिश्री के प्रवचन, 10:30 बजे मुनिश्री की आहारचर्या, 12 बजे सामायिक व सांय 5:30 बजे महाआरती एवं जिज्ञासा समाधान का कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।



 

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