महंगाई से राहत के आसार नहीं

Samachar Jagat | Wednesday, 14 Feb 2018 10:05:25 AM
No relief from inflation
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रिजर्व बैंक ने पिछले सप्ताह बुधवार को मौद्रिक समीक्षा में कहा कि वित्तीय वर्ष 2017-18 की आखिरी तिमाही में भी महंगाई पंाच फीसदी के पार रहेगी। इससे जनता को महंगाई से फिलहाल राहत मिलने के आसार नहीं है। केंद्रीय बैंक ने विकास दर का अनुमान भी 6.7 से घटाकर 6.6 फीसदी कर दिया है। केंद्रीय बैंक ने कहा कि जनवरी में पेट्रोल और डीजल की घरेलू कीमतें काफी बढ़ी है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की तेजी का परिणाम है। लिहाजा 2017-18 की चौथी तिमाही के लिए मुद्रास्फीति अनुमान बढ़ाकर 5.1 प्रतिशत किया गया है। रिजर्व बैंक के मुताबिक खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से दिसंबर में महंगाई दर बढक़र 5.21 फीसदी हो गई, जबकि नवंबर में यह 4.88 फीसदी थी। जबकि दिसंबर में समाप्त तीसरी तिमाही में खुदरा मुद्रास्फीति 4.6 प्रतिशत रही।

अगले वित्त वर्ष की पहली छमाही में इसके 5.1 से 5.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है, पहले यह 4.3 से 4.7 प्रतिशत की संभावना  थी। रिजर्व बैंक के अनुसार अगले वित्त वर्ष 2018-19 की दूसरी छमाही में मुद्रास्फीति घटकर 4.5 से 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है। कृषि क्षेत्र में संकट और औद्योगिक उत्पादन में सुस्ती के बीच रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2017-18 के लिए विकास दर अनुमान को भी घटाकर 6.7 फीसदी से 6.6 प्रतिशत कर दिया है। जबकि सरकार ने इस वित्त वर्ष में विकास दर सात प्रतिशत के पार जाने की उम्मीद जताई है। वित्त वर्ष 2018-19 में वृद्धि दर 7.2 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। रिजर्व बैंक ने समीक्षा में मुद्रास्फीति के पांच कारण बताए हैं। इसमें पहला राज्यों में सातवें वेतन आयोग लागू होने से खर्चे बढ़े। दूसरा कच्चे तेल के ऊंचे दामों ने खुदरा महंगाई बढ़ाई।

तीसरे सीमा शुल्क में बढ़ोतरी से कई उत्पाद महंगे होने, चौथा खरीफ फसलों की एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) में बढ़ोतरी से मुद्रास्फीति बढ़ने और पंाचवा कारण राजकोषीय घाटा यानी सरकारी खर्च ज्यादा होने का असर बताया है। केंद्रीय बैंक ने राजकोषीय घाटे पर चिंता प्रकट करते हुए आम बजट में राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3.2 फीसदी के लक्ष्य से अािधक 3.5 फीसदी रहने का अनुमान लगाया है। इसका महंगाई पर सीधा प्रभाव तो पड़ेगा ही साथ ही राजकोषीय मोर्चे पर फिसलन के व्यापक वित्तीय प्रभाव होंगे। विशेष रूप से ऋण की लागत और बढ़ जाएगी। अगले वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा और बढ़ने का अंदेशा है क्योंकि चुनावी साल में सरकार की प्राथमिकता वित्तीय प्रबंधन के बजाए लोक लुभावन योजनाओं पर आवंटन बढ़ाने की ज्यादा रहती है। रिजर्व बैंक ने मौजूदा वित्त वर्ष को आखिरी तिमाही में मुद्रास्फीति के 5.1 फीसदी रहने का अनुमान लगाया है और उसके मुताबिक अगले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में यह 5.1 फीसदी से 5.6 फीसदी के बीच होगी। अगर राजकोषीय घाटा भी बढ़ने का अनुमान है और मुद्रास्फीति भी, तो अगले वित्त वर्ष की बाबत एक मोटा सा अनुमान अंदाजा लगाया जा सकता है।  फिर भी, वित्त मंत्रालय से लेकर नीति आयोग तक, सारे नीति नियंता अगले वित्त वर्ष की सुनहरी तस्वीर पेश करने में कोई कसर नहीं रखते। मौद्रिक समीक्षा नीति के अनुसार मुद्रास्फीति का परिदृश्य कई तरह की अनिश्चिितताओं से घिरा हुआ है। जिसके रिजर्व बैंक ने पांच कारण बताए हैं। जिनके कारण महंगाई के और विकट रूप लेने का अंदेशा है।

जाहिर है यह स्थिति चुनावी साल में सरकार के लिए चिंता का सबब बन सकती है। यह अलग बात है कि रिजर्व बैंक ने अगल वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में मुद्रास्फीति में तनिक कमी आने का अनुमान जताया है। रिजर्व बैंक ने यद्यपि चालू वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही में भी महंगाई पांच फीसदी से पार जाने की बात कही है तथापि केंद्र सरकार के कुछ कार्यों को लेकर उसकी सराहना भी की है। रिजर्व बैंक ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढांचे पर जोर को लेकर सराहा है, वहीं नोटबंदी और जीएसटी के दोहरे झटके का प्रभाव कम होने और विकास तेज होने की बात कही है। रिजर्व बैंक का कहना है कि बैंकों के पुनर्पूंजीकरण और दिवाला संहिता से निवेश के लिए मांग बढ़ेगी। शीर्ष बैंक को वैश्विक बाजार में सुधार से निर्यात तेज होने की उम्मीद है साथ ही निवेश और पूंजी पर्याप्तता में सुधार की आशा है।

यहां यह बता दें कि हर दो महीने पर मौद्रिक समीक्षा जारी करने से पहले रिजर्व बैंक को इस दुविधा से जूझना पड़ता है कि वह किसे अहमियत दे, वृद्धि दर को प्रोत्साहन देने वाले उपायों तथा बाजार की अपेक्षाओं को या महंगाई नियंत्रण को। मौजूदा वित्त वर्ष की छठी और नई मौद्रिक समीक्षा से जाहिर है कि रिजर्व बैंक ने महंगाई नियंत्रण को प्राथमिकता दी है। पर साथ ही इस बात का भी खयाल रखा है कि बाजार के माहौल पर कोई प्रतिकूल असर न पड़े। रिजर्व बैंक ने पिछले साल असर न पड़े। रिजर्व बैंक ने पिछले साल अगस्त में रेपो दर को चौथाई फीसदी घटाकर छह फीसदी किया था। लेकिन घटाकर छह फीसदी किया था। लेकिन तब से उसने लगातार तीसरी बार मुख्य नीतिगत दर यानी रेपो दर को छह फीसदी पर यथावत रखा है।

यहां यह बता दें कि रेपो वह दर है जिस पर रिजर्व बैंक, बैंकों को अल्पावधि ऋण देता है। रिवर्स रेपो दर, यानी जिस दर यानी जिस दर पर बैंक रिजर्व बैंक के पास अपना जमा रखते हैं, को भी रिजर्व बैंक ने जस का तस, 5.75 फीसदी पर बनाए रखा है। नीतिगत दरों को यथावत रखने का निर्णय रिजर्व बैंक की मौद्रिक समीक्षा समिति ने आम राय से किया है। समिति ने रेपो तथा रिवर्स रेपो दरों में कोई फेरबदल न करने की जरूरत महसूस की। दिसंबर में मुद्रास्फीति 17 महीनों के उच्चतम स्तर यानी 5.21 फीसदी पर पहुंच गई। इसमें कोई राहत मिलने के आसार फिलहाल नहीं दिखते, बल्कि महंगाई का ग्राफ और ऊपर चढ़ने की आशंका है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में बढ़ोतरी का रूझान कायम है। भारत अपनी जरूरत या खपत का करीब तीन चौथाई तेल आयात करता है।

इसलिए कच्चे तेल की कीमत में बढ़ोतरी से जहां एक ओर आयात का बिल बढ़ता है और फलस्वरूप व्यापार घाटे में बढ़ोतरी होती है, वहीं दूसरी तरफ परिवहन तथा ढुलाई का खर्च बढ़ जाने से तमाम चीजों की कीमतें चढ़ने लगती है। रिजर्व बैंक ने आवास और वाहन ऋण के पुराने ग्राहकों को राहत देते हुए अगले वित्त वर्ष से इसे सीमांत लागत ऋण दर (एमसीएलआर) से जोड़ने का फैसला किया है। इससे पुराने ऋणों के लिए भी ब्याज दर में कमी आने की उम्मीद है। केंद्रीय बैंक के मुताबिक, लगातार चिंता जताए जाने के बावजूद ज्यादातर पुराने ऋणों को एमसीएलआर व्यवस्था में स्थानांतरित नहीं किया गया है। इसके मद्देनजर एक अप्रैल 2018 से आधार दर को भी एमसीएलआरा वह न्यूनतम दर है, जिससे नीचे कोई बैंक किसी को अधार नहीं दे सकता।

यहां यह बता दें कि एमसीएलआर की व्यवस्था एक अप्रैल 2016 से शुरू की गई थी। रिजर्व बैंक नियमित रूप से एमसीएलआर की समीक्षा करता है। इस कारण पिछले कुछ समय में नीतिगत दरों में की गई कटौती का पूरा लाभ नए ऋण लेने वालों को मिला है, लेकिन पुराने ऋण लेने वालों को मिला है, लेकिन पुराने ऋण लेने वालों को इसका लाभ नहीं मिल रहा  था। इसी वजह से रिजर्व बैंक ने एक अप्रैल से आधार दर को भी एमसीएलआर से जोड़ने का फैसला किया है। एमसीएलआर नीतिगत दरों के संकेतों के प्रति ज्यादा संवेदनशील है। आधार दर को इससे जोड़ने के नए दिशा निर्देश शीघ्र ही जारी होंगे। रिजर्व बैंक ने छोटे उद्योगों को वकाया भुगतान में छह माह की छूट दी है।

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