राजस्थान में आर्थिक विकास की संभावनाएं

Samachar Jagat | Thursday, 30 Aug 2018 11:27:03 AM
Prospects for economic development in Rajasthan

आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुये सत्ता पक्ष राज्य में बहुत अधिक आर्थिक विकास के दावे कर रहा है। जबकि सत्ताकांक्षी पक्ष इनको सिरे से नकार रहा है। अगर वर्तमान संदर्भ को छोड़ कर परिस्थितियों का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण किया जाये तो हर एक को मानना पड़ेगा कि भारत की आजादी के बाद जिस राजस्थान का निर्माण हुआ उसने चहुमुखी विकास किया है। जिसमें प्राय हर सरकार का योगदान एक तरह से समान सा ही रहा है। सबसे महत्वपूर्ण तो यह है कि ऐसा करने में उद्यमी प्रवृति के राजस्थानियों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। समग्र रूप से देखा जाये तो पूर्व के दशकों में राजस्थान में अतुलनीय विकास हुआ है। 

तब ही तो राजस्थान नहर में रेगिस्तान को चावल व गेहूँ के उत्पादन का हब बना दिया, कोटा में परमाणु ऊर्जा उत्पादन की कई इकाइयां लगी, जयपुर का जवाहरात उद्योग एवं व्यवसाय विश्व प्रसिद्ध हो गया, वस्त्र निर्माण के क्षेत्र में भी भीलवाड़ा एक समय ब्रांड बन चुका था, जयपुर, उदयपुर, जोधपुर, भरतपुर पर्यटन के क्षेत्र में राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय पहचान बना सके, राजस्थान का हैण्डीक्राफ्ट दुनियां भर में अपना विशेष स्थान बना सका। राजस्थान के मारवाड़ी उद्यमियों ने संसार भर में नाम कमाया है। अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, जर्मनी, यूएई, कुवैत, हांगकांग, मलेशिया, नेपाल, भूटान जैसे दर्जनों देशों की अर्थव्यवस्था मेें प्रवासी एवं एनआर भारतीयों का योगदान अकल्पनीय हैं। जिसमें राजस्थानियों का हिस्सा बहुत अधिक है।

नये संदर्भों में भी विकास की रफ्तार अप्रासंगिक नहीं हुई है। किसी समय का औद्योगिक नगरी कोटा आज ‘शिक्षा की राजधानी’ के रूप में जाना जाने लगा है। जहां कोचिंग के माध्यम से इंजीनियरिंग, मेडिकल, प्रबंध, शिक्षा, सूचना प्रौद्योगिकी, फार्मा, सी.ए.सी.एस., नर्सिंग आदि क्षेत्रों में भारत भर से और पड़ोसी देशों से प्रति वर्ष लाखों की संख्या में आशार्थी अपना कॅरियर बनाने आते हैं। प्रांत के कई हिस्सों में औद्योगिक क्षेत्र बने हैं जिसमें छोटे स्तर की औद्योगिक इकाईयां भी स्थापित हुई है। जिनमें निमराना जैसे वैसे क्षेत्र भी भी हैं जहां बड़ी संख्या में जापानी लोग रहते हैं। 

राज्य के कई क्षेत्रों पेयजल की बड़ी एवं छोटी, सिंचाई की नहरें, क्लस्टर आधारित व्यापारिक क्षेत्र, आवासीय परियोजनाएं, जेम पार्क जैसे विशेष आर्थिक क्षेत्र बिजली उत्पादन इकाईयां भी अच्छी संख्या में लगी है। पूरे राज्य में सडक़ों का जाल बिछा है, रेलों की संख्या व मार्गों की लम्बाई की दृष्टि से विकास को तुलनात्मक रूप से संतोषजनक ही कहा जायेगा। राज्य के प्राय: सभी गांव सडक़ों से जुड़ चुके हैं। यह ही स्थिति बिजली की पहुँच की है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में विकास बहुत तेजी से हुआ है। विश्वविद्यालयों की संख्या सरकारी और निजी को मिला कर एक सौ के करीब हो गई है। राज्य में निजी विश्वविद्यालयों का तो जाल फैलता जा रहा है। कॉलेजों तथा प्रोफेशनल शिक्षण संस्थानों की संख्या भी प्राप्त बढ़ी ही है।

यह सब कुछ कई विपरीत परिस्थितियों के साथ हुआ है। राजस्थान देश का करीब दसवां हिस्सा भू भाग की दृष्टि से है जबकि यहां भूजल की उपलब्धि मुश्किल से एक प्रतिशत है। दो तिहाई हिस्सा रेगिस्तान है। बाकी बचे क्षेत्र में भी भूमि स्तरीय उपजाऊ नहीं है। एक ही वर्ष के दौरान राज्य में सूखा पडऩा और बाढ़ आना आम बात है। प्राय: हर तीसरे साल यहां भयंकर सूखे का सामना करना पड़ता है। सिंचाई साधनों की कमी के कारण उपलब्ध कृषि योग्य भूमि का भी पूरा उपयोग नहीं हो पाता है।

राज्य में आर्थिक विकास में बड़ी बाधा अभी भी रूढिय़ों, परम्पराओं, निरक्षरता, सामाजिक स्तर पद महिलाओं का शोषण, सूचना न्यूनता वित्तीय संसाधनों की अपर्याप्तता, उपलब्ध मानवीय संसाधनों का कौशल के अभाव में कम उपयोग उद्यमियों का कम उपयोग जैसी समस्याएं मूलत: बनी हुई है। एक समस्या कोटा, भीलवाड़ा, जयपुर जैसे एक समय विकास कर चुके क्षेत्रों की परिस्थितियां पुन: बिगड़ जाने की रही है। इसके लिये आर्थिक के साथ ही गैर आर्थिक कारण भी जिम्मेदार रहे हैं। ऐसे में यह चिंतन करने की जरूरत है कि वर्तमान परिस्थितियों में सकारात्मक और त्वरित परिवर्तन कैसे किया जा सकता है। 


इसके लिये यहां बिजली, पानी, परिवहन सुविधाओं को यथानुसार बनाना पहली प्राथमिकता होनी चाहिये। इसके लिये बिजली उत्पादन वृद्धि के साथ ही वितरण के दौरान होने वाली छीजत व चोरी जिसका प्रतिशत भाग तीस के आस पास है अन्तर्राष्ट्रीय 12.5 प्रतिशत के स्तर तक लाने की जरूरत है। राज्य में जब बिजली की कमी की समस्या स्थाई ही है तो औद्योगिक क्षेत्र में स्वनिर्मित बिजली के उपयोग की इजाजत को भी खुला कर देना चाहिये। जिससे बिजली उत्पादन की छोटी इकाईयों की प्रवर्ति को आगे बढ़ाया जा सके। सरकार को बिजली वितरण में अपने एकाधिकार को भी पूरी तरह समाप्त कर देना चाहिये। इस एक परिवर्तन में राज्य में औद्योगिक विकास का वातावरण अधिक सकारात्मक बनाया जा सकता है। ऐसा करने से ही राज्य में भारत व बाहर के निवेशकों को आकर्षित किया जा सकता है। 

राज्य सरकार को अपने इस सोच में परिवर्तन करना चाहिये कि बाहरी निवेशक केवल टैक्स बचाने या कम देने के लिये ही निवेश के लिये आते हैं। जबकि वे कमाई के स्थाई स्त्रोत के लिये ऐसा करते हैं। यह तब ही हो सकता है जब ढांचागत सुविधाएं पर्याप्त प्रक्रिया से गुजरने की समय सीमा अल्पतम, हर स्तर पर घूस देने की मजबूरी न्यूनतम, पैसा खर्च करने के बाद काम हो जाने की निश्चितता, विभिन्न सरकारी विभागों की छापेमारी की शून्यता हो। ऐसा अगर नहीं किया जाता है तो राजस्थान स्थापना की औपचारिकताएं निभाने का विशेष मतलब नहीं रह जाता है। क्योंकि कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात बल्कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य भी निवेश के लिये हमसे आगे होकर तेजी से कार्यरत दिखाई दे रहे हैं।

सबसे जरूरी तो यह है कि राजनीति के माध्यम से विकास हेतु सकारात्मक वातावरण बनाया जाये तथा देश में जीएसटी के लागू होने के बाद राज्य की केन्द्र पर निर्भरता आधारभूत रूप से बढ़ गई है। उसको ध्यान में रखते हुये लघु उद्योगपतियों, व्यापारियों, व्यवसायियों में आत्मविश्वास पैदा करने के लिये उन्हें शिक्षित एवं प्रशिक्षित करने के लिये स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुये लगातार सरकारी प्रयत्नों का जारी रखा जाये। सरकार को डिजिटल व्यवस्था को व्यवहार में अपनाना चाहिये।

रिटर्न भरने वालों से ऑनलाइन के बाद हार्डकॉपी मांगना एक तरफ अपनी ही व्यवस्था पर सरकार का भरोसा नहीं होना प्रदर्शित करता है तो दूसरी ओर संबंधित पक्षों पर दुहरा भार डालना ही है। ब्यूरोक्रेसी की जो छवि अभी भी ‘बुरो करसी’ की बनी हुई है उसे उसको व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह बनाने एवं हर कार्य समयबद्ध रूप से करवाने की प्रतिबद्धता से ही दूर किया जा सकता है। इसका दूसरा सीधा अर्थ यह है कि पब्लिक सर्वेंट को पब्लिक का मास्टर बनने के हर रास्तों को रोका जाये। सरकारें अब एमओयू के स्थान पर समझौता व संविदा करना प्रारंभ कर देना चाहिये। जिससे आने वाले निवेश के बारे में निश्चितंता हो सके।
(ये लेखक के निजी विचार है)



 

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