गिरकर भी दुनिया में सबसे ऊपर

Samachar Jagat | Wednesday, 05 Dec 2018 03:41:24 PM
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अर्थव्यवस्था में अनुमान से ज्यादा सुस्ती के साथ वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही में विकास दर 7.1 फीसदी पर आ गई है। पहली तिमाही में 8.2 फीसदी की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) वृद्धि दर के मुकाबले इसमें एक फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई है। जबकि विकास दर 7.1 फीसदी तक गिरने के बावजूद भारत दुनिया में सबसे तेज विकास करने वाली अर्थव्यवस्था बनी हुई है। चीन की जून-सितंबर की तिमाही में विकास दर 6.5 फीसदी रही और ऐसे में यह तमगा भारत के पास बना रहेगा। अक्टूबर-नवंबर के दौरान ब्याज दर, तेल के ऊंचे दामों और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के प्रदर्शन का असर अगली तिमाही में दिखेगा। केंद्रीय सांख्यिकी विभाग (सीएसओ) ने बीते सप्ताह शुक्रवार को ये आंकड़े जारी किए।


 सीएसओ के अनुसार वित्त वर्ष 2018-19 की दूसरी तिमाही में जीडीपी 33.98 लाख करोड़ रुपए रही जो एक साल पहले इसी तिमाही में 31.72 लाख करोड़ रुपए पर थी। तिमाही में खनन और कृषि मेें सुस्ती तिमाही है। खनन और कृषि में सुस्ती देखी गई, जबकि बिजली, वाणिज्य, होटल और सरकारी सेवाओं से जुड़े क्षेत्रों में तेजी आई है। कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 5.3 फीसदी लुढक़कर 3.8 फीसदी पर आ गई है। जबकि खनन क्षेत्र मेें वृद्धि दर 2.4 फीसदी से 0.1 फीसदी पर आ गई है। कोर सेक्टर में वृद्धि दर पिछली तिमाही की 5 फीसदी की जगह इस बार 4.8 फीसदी रही है। विनिर्माण क्षेत्र में 7.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जो एक साल पहले इसी तिमाही में 7.1 फीसदी थी। बिजली क्षेत्र में वृद्धि दर 9.2 फीसदी, वाणिज्य-होटल क्षेत्र में 6.8 फीसदी और सरकारी सेवाओं में 10.9 फीसदी रही है। निर्माण क्षेत्र में भी 7.8 फीसदी की वृद्धि रही, जो एक साल पहले 3.1 फीसदी थी।

सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की विकास दर देश की आर्थिक सेहत को मापने का पैमाना होता है और यह एक अवधि में वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन की कुल कीमत है। कृषि उद्योग और सेवा क्षेत्र का इसमें प्रमुख योगदान रहता है। भारत में जीडीपी की गणना तिमाही आधार पर होती है। इसमें बढ़त का मतलब है कि देश में उत्पादन और लोगों की कमाई बढ़ने के साथ ज्यादा खर्च कर रहे हैं। वहीं जीडीपी में कमी का मतलब है अर्थव्यवस्था मेें गिरावट का संकेत। यदि जीडीपी बढ़ती है तो देश की अच्छी छवि से विदेशी निवेशक भी आकर्षित होते है। यों यह मानकर चलते हैं कि बढ़ती जीडीपी वाले देश में लोगों की खर्च करने की ताकत भी बढ़ती जाएगी। ऐसे में इस बाजार का इस्तेमाल किया जाए। घरेलू बाजार में भी उत्साह दिखता है। वहीं इसमें गिरावट होती है तो निवेशकों को कंपनियों या शेयर बाजार में निवेश ज्यादा मुनाफे का सौदा नहीं लगता। म्युचुअल फंड और अन्य स्कीम पर असर पड़ता है। 

यहां यह बता दें कि जीडीपी बढ़ने से देश में रोजगार के मौके बढ़ते हैं। देशी-विदेशी कंपनियां मांग बढ़ने के साथ ज्यादा निवेश और ज्यादा भर्तियां करती है। उद्योग और सेवा क्षेत्र में सुधार से संगठित और असंगठित क्षेत्र में वेतन भी बढ़ता है। जैसे रक्षा क्षेत्र में वृद्धि दर्ज की गई है, तो इसका मतलब हुआ कि वहां उपकरणों की भविष्य में जरूरत ज्यादा होगी। सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर का आकलन केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय करता है। इसके लिए एक आधार वर्ष (अभी 2011-12) माना जाता है और उसी आधार पर उत्पादन बढ़ने-घटने की रफ्तार से जीडीपी की गणना होती है। सीएसओ केंद्र व राज्यों की एजेंसियों के साथ आंकड़े जुटाता है। जीडीपी में मुख्य तौर पर 8 औधोगिक क्षेत्रों के आंकड़े जुटाए जाते हैं, जिनमें कृषि, खनन, मैन्युफैक्चरिंग, बिजली, निर्माण, व्यापार, रक्षा और अन्य सेवाएं शामिल है। संप्रग सरकार (यूपीए) के जीडीपी के आंकड़ों का विवाद भी पिछले दिनों सामने आया है।

सीएसओ ने आधार वर्ष 2011-12 पर आकलन कर नए आंकड़े दिए हैं। जिससे यूपीए कार्यकाल के ज्यादातर वर्षों की विकास दर एक फीसदी तक घट गई। इन आंकड़ों में यूपीए अर्थव्यवस्था की औसत वृद्धि दर 6.7 फीसदी रही, जबकि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में यह 7.3 फीसदी रही है। केंद्र सरकार के जीडीपी वृद्धि दर के ताजा आंकड़ों पर निराशा जताई है। आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद गर्ग ने बीते शुक्रवार को ट्वीट किया कि जीडीपी वृद्धि दर 7.1 फीसदी निराशाजनक लगती है। वहीं राजकोषीय घाटा भी अक्टूबर में ही लक्ष्य को पार हो गया। सरकार ने इस साल बजट में पूरे वित्त वर्ष के लिए 6.24 लाख करोड़ का लक्ष्य तय किया था। अक्टूबर तक यह घाटा 6.48 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गया। यह बजट आकलन का 103.90 फीसदी है।

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