Rajasthan: अब इस अभियान का हिस्सा बन गए हैं अशोक गहलोत, केन्द्र सरकार से कर डाली है ये मांग

Hanuman | Thursday, 18 Dec 2025 02:22:49 PM
Rajasthan: Ashok Gehlot has now become part of the campaign and has made this demand to the central government

जयपुर। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अब #SaveAravalli अभियान का हिस्सा बन गए हैं। इस बात की जानकारी उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से दी है। पूर्व सीएम गहलोत ने एक्स के माध्यम से कहा कि आज मैं अपनी प्रोफाइल पिक्चर (डीपी) बदलकर #SaveAravalli अभियान का हिस्सा बन रहा हूं। यह सिर्फ एक फोटो नहीं, एक विरोध है उस नई परिभाषा के खिलाफ जिसके तहत 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को 'अरावली' मानने से इंकार किया जा रहा है। मेरा आपसे अनुरोध है कि अपनी प्रोफाइल पिक्चर बदलकर इस अभियान से जुड़ें।

अशोक गहलोत ने इस संबंध में आगे कहा कि अरावली के संरक्षण को लेकर आए इन बदलावों ने उत्तर भारत के भविष्य पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। यह निर्णय हमारे अस्तित्व के लिए खतरनाक है क्योंकि मरुस्थल एवं लू के खिलाफ दीवार: अरावली कोई मामूली पहाड़ नहीं, बल्कि कुदरत की बनाई 'ग्रीन वॉल' (Green Wall) है। यह थार रेगिस्तान की रेत और गर्म हवाओं (लू) को दिल्ली, हरियाणा और यूपी के उपजाऊ मैदानों की ओर बढ़ने से रोकती है। अगर छोटी पहाड़ियां (Gaping Areas) खनन के लिए खुल गईं, तो रेगिस्तान हमारे दरवाजे तक आ जाएगा और गर्म हवाएं तापमान को बढ़ा देंगी।

ये पहाड़ियां और यहां के जंगल एनसीआर और आसपास के शहरों के 'फेफड़ों' की तरह काम करते हैं। ये धूल भरी आंधियों को रोकते हैं और जानलेवा प्रदूषण को कम करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं। दिल्ली और आसपास के इलाके में अरावली के बावजूद इतनी गंभीर स्थिति है तो अरावली के बिना कैसी स्थिति होगी, उसकी कल्पना करना भी वीभत्स है। अरावली हमारे लिए पानी का मुख्य रिचार्ज जोन है। अरावली की चट्टानें बारिश के पानी को जमीन के भीतर भेजकर भूजल रिचार्ज करती हैं। अगर पहाड़ खत्म हुए, तो भविष्य में पीने के पानी की गंभीर कमी का सामना करना पड़ेगा, जिससे वन्यजीव लुप्त होने की कगार पर आ जाएंगे तथा इकोलॉजी को खतरा होगा।

अशोक गहलोत ने कहा कि वैज्ञानिक सच यह है कि अरावली एक निरंतर शृंखला है। इसकी छोटी पहाड़ियां भी उतनी ही अहम हैं जितनी बड़ी चोटियां। अगर दीवार में एक भी ईंट कम हुई, तो सुरक्षा टूट जाएगी।

अरावली को इसके 'पर्यावरणीय योगदान' से आंका जाए

गहलोत ने कहा कि हम केंद्र सरकार और माननीय सुप्रीम कोर्ट से विनम्र निवेदन करते हैं कि भावी पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए इस परिभाषा पर पुनर्विचार करें। अरावली को 'फीते' या 'ऊंचाई' से नहीं, बल्कि इसके 'पर्यावरणीय योगदान' से आंका जाए।

PC: hindi.news24
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