वैसाख मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी के रूप में जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। मोहिनी एकादशी का व्रत करने से सहस्त्र गोदान का फल प्राप्त होता है। मोहिनी एकादशी व्रत कथा....
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पौराणिक कथाओं के अनुसार, सरस्वती नदी के रमणीय तट पर भद्रावती नगरी में धृतिमान नामक राजा राज्य करते थे। उसी नगर में एक धनपाल नामक वैश्य रहता था जो धनधान्य से परिपूर्ण समृद्धिशाली था। भगवान विष्णु की भक्ति में लीन रहते हुए वह सदा पुन्यकर्म में ही लगा रहता था और वह दूसरों के लिए कुआँ, मठ, बगीचा, पोखरा और घर बनवाया करता था।
उसके पाँच पुत्र थे, उसका सबसे छोटा पुत्र धृष्ट्बुद्धि हमेशा बड़े-बड़े पापों में संलग्न रहता था। वह जुए, वेश्याओं से मिलने और अन्याय के मार्ग पर चलकर पिता का धन बरबाद किया करता। एक दिन उसके पिता ने तंग आकर उसे घर से निकाल दिया और वह दर-दर भटकने लगा। इसी प्रकार भटकते हुए भूख-प्यास से व्याकुल वह महर्षि कौँन्डिन्य के आश्रम जा पहुँचा। वह मुनिवर कौण्डिन्य के पास गया और हाथ जोड़कर बोला : ’ब्रह्मन ! द्विजश्रेष्ट ! मुझ पर दया करके कोई ऐसा व्रत बताइए, जिसके पुण्य के प्रभाव से मेरी मुक्ति हो।’
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महर्षि कौण्डिन्य बोले : वैशाख के शुक्ल पक्ष में ’मोहिनी’ नाम से प्रसिद्द एकादशी का व्रत करो। ’मोहिनी एकादशी’ का उपवास करने से प्राणियों के अनेक जन्मों के किए हुए मेरु पर्वत जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं।’ मुनि का यह वचन सुनकर धृष्ट्बुद्धि का चित्त प्रसन्न हो गया। उसने कौण्डिन्य के उपदेश से विधिपूर्वक ’मोहिनी एकादशी’ का व्रत किया। इस व्रत के करने से वह निष्पाप हो गया और दिव्य देह धारण कर गरुड़ पर आरूढ़ हो सब प्रकार के उपद्रवों से रहित श्रीविष्णुधाम को चला गया।
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