वायु प्रदूषण से दम घुटने लगा

Samachar Jagat | Thursday, 18 Apr 2019 05:03:16 PM
Air pollution began to suffocate

वायु प्रदूषण के कारण देश में जिस हिसाब से मौतें हो रही है, वह आंकड़ा वाकई चौंकाने वाला है। उस पर हेल्थ इफेक्ट इंस्टीट्यूट की हालिया रिपोर्ट और भी कान खड़े करने वाली है, जिसने देश को समय रहते प्रभावी पग उठाने की सलाह दी है। वायु प्रदूषण के मामले में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा जारी आंकड़ों में भारत के जिन शहरों को सबसे ज्यादा प्रदूषित बताया गया है, उनमें प्रदेश सरकारो द्वारा लाजिमी कदम उठाने में बरती जा रही कोताही है। इसका खामियाजा समूचे देश को भुगतना पड़ रहा है। फिर केंद्र सरकार के इस बाबत किए गए प्रयास कहां पर्याप्त है? पिछले एक दशक से लाखों लोगों, भले ही वे गरीब हों या अमीर, के स्वास्थ्य से इसी वायु प्रदूषण की वजह से खिलवाड़ हो रहा है। लोग ताजा सांस लेने को तरस गए है। 

कोई ऐसा नहीं बचा है, जिसे एलर्जी, कफ, आंखों में जलन, दिल के रोगों के अलावा फेफड़ों की बीमारी न हो। जो धूम्रपान नहीं करते, वायु प्रदूषण के कारण वे भी इन्हीं रोगों का शिकार हो रहे हैं। जो ताजा आंकड़े जारी हुए हैं उनके मुताबिक तम्बाकू का सेवन करने वालों की सेहत ज्यादा खराब है। फिर चाहे वह घर हो या बाहर, दोनों ठौर में वायु प्रदूषण में इजाफा कर रहे हैं। वहीं घरों में केरोसीन तेल तथा ईंधन के रूप में प्रयुक्त की जाने वाली लकड़ी के प्रयोग पर कड़ी निगरानी और उस पर अमल ही हमें भयावह स्थिति से बचा सकता है। बेशक धुएं से फैलते प्रदूषण की जगह घर-घर गैस सिलेंडर प्रयुक्त होने लगा है। 

लेकिन अभी इस ओर अधिक प्रयासों की दरकार है। तभी घर के अंदर पैदा होने वाले प्रदूषण से निजात मिलेगी। फिर घर से बाहर कालिख, धूल के कण, ओजोन, सल्फर तथा नाइट्रस आक्साइड के अलावा अपने वाहनों व फैक्टरियों के साथ बिल्डिंग निर्माण कार्यों पर रोक लगानी पड़ेगी। अगर इच्छित परिणाम चाहिए। अब चूंकि आम चुनाव होने जा रहे हैं। इन चुनावों में क्यों न वायु प्रदूषण को चुनावी मुद्दा बनाया जाए? बार-बार स्वच्छ हवा के प्रलोभनों के लिए अपनाई गई वादा खिलाफी की सरकारी नीति से जनता पहले ही परेशान है। बढ़ते प्रदूषण को लेकर बढ़ रही वैश्विक चिंता के बीच यह खुलासा और भी परेशान करने वाला है कि इस वर्ष कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में और तेजी आ सकती है।

ब्रिटेन में मौसम विभाग के कार्यालय और एक्जेटर विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने पाया है कि हवाई स्थित मोनालोआ वैद्यशाला में वायुमंडल में कार्बन डाई आक्साइड की सघनता में 1958 से अब तक 30 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इसका मुख्य कारण जीवाश्म ईंधनों, वनों की कटाई और सीमेंट उत्पादन है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस साल कार्बन-डाई आक्साइड का उत्सर्जन ज्यादा होगा। अगर ऐसा हुआ तो फिर 2019 अब तक का सबसे गर्म साल रहेगा। यहां यह बता दें कि वर्ष 2018 में धरती का तापमान 1880 के बाद से अब तक का चौथा सबसे गर्म तापमान रहा। 

नासा के गोडार्ड इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस स्टडीज के मुताबिक 2018 में वैश्विक तापमान 1951, 1980 के औसत तापमान से 0.83 डिग्री सेल्सियस ज्यादा था। संयुक्त राष्ट्र की ग्लोबल फॉरेस्ट रिसोर्स एसेसमेंट (जीएफआरए) रिपोर्ट में कहा गया है कि 1990 से 2015 के बीच कुल वन क्षेत्र 3 फीसदी घटा है और यह क्षेत्र दक्षिण अफ्रीका के आकार के बराबर है। प्राकृतिक वन क्षेत्र में कुल वैश्विक क्षेत्र की दोगुनी अर्थात् 6 फीसदी की कमी आई है। उष्णकटिबंधीय वन क्षेत्रों की स्थिति और भी दयनीय है।

यहां सबसे अधिक 10 फीसदी की दर से वन क्षेत्र का नुकसान हुआ है। वनों के विनास से वातावरण जहरीला हुआ है। इससे जीवन का सुरक्षा कवच मानी जाने वाली ओजोन की परत को नुकसान पहुंच रहा है। बेहतर होगा कि वैश्विक समुदाय बढ़ते तापमान और प्रदूषण से निपटने के लिए कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन पर नियंत्रण का कोई ठोस प्रभावी उपाय खोजें। एजेंसी
 



 

यहां क्लिक करें : हर पल अपडेट रहने के लिए डाउनलोड करें, समाचार जगत मोबाइल एप। हिन्दी चटपटी एवं रोचक खबरों से जुड़े और अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें!

loading...
ताज़ा खबर

Copyright @ 2019 Samachar Jagat, Jaipur. All Right Reserved.