मौत से ठन गई और अनंत यात्रा पर चले गए अटलजी

Samachar Jagat | Friday, 17 Aug 2018 10:20:31 AM
Atalji went on an eternal journey and died

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ठन गई! मौत से ठन गई! बरसों पहले इन शब्दों को कागज पर दर्ज कर चुके अटल बिहारी वाजपेयी की सचमुच मौत से ठन गई और वह अनंत यात्रा पर चले गए।

शब्दों के इस अलबेले चितेरे की रवानगी से दिल में कसक सी उठी तो इस चितेरे की ही कविता की पंक्तियां कुछ इस तरह ढांढस बंधाती नजर आईं
‘पार पाने का कायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफां का, तेवरी तन गई।’

वाजपेयी ने यह जानते हुए पोखरण में परमाणु परीक्षण का फैसला किया कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय में इसकी प्रतिकूल प्रतिक्रिया होगी। भारत को ऊंचाइयों पर पहुंचाने के लिए मानो उनकी यह सोच उन्हें अपने फैसले पर अटल रखे हुए थी कि
बाधाएं आती हैं आएं,

घिरें प्रलय की घोर घटाएं
पावों के नीचे अंगारे
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं
निज हाथों में हंसते हंसते
आग लगा कर जलना होगा,
कदम मिला कर चलना होगा।

सौम्य, सरल और मृदुभाषी वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन ये रिश्ते सुधरे तो नहीं, उल्टे करगिल युद्ध का कभी न मिटने वाला घाव दे गए। सीमा पर अपने प्राणों का बलिदान देते जवानों की खबरें मानो वाजपेयी को संदेश देती थीं कि अमन के लिए बस से लाहौर जाना निरर्थक था। उनकी यह कविता संभवत: उनकी यही दशा दर्शाती है

अपनी ही छाया से बैर,
गले लगने लगे हैं गैर,
खुदकुशी का रास्ता,
तुम्हें वतन का वास्ताए
बात बनाएं, बिगड़ गई
दूध में दरार पड़ गई

वाजपेयी सत्ता के गलियारों में अजातशत्रु कहलाते थे। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जगत में अपनी अलग पहचान रखने वाले इस अजातशत्रु की 13 माह पुरानी सरकार वर्ष 1999 में केवल एक वोट से गिरी थी। हंसते हंसते प्रधानमंत्री पद छोडऩे वाले वाजपेयी ने कभी कटाक्ष की या आरोपों की मदद नहीं ली। उनके व्यक्तित्व की विशालता उनकी ही कविता की ये पंक्तियां परिचायक हैं ,
हार नहीं मानूंगा, रार नई ठानूंगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं,
गीत नया गाता हूं

अपने लंबे राजनीतिक सफर में कई उतार चढ़ाव देखने वाले वाजपेयी का भहदी प्रेम जगजाहिर है। संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भहदी का जादू सर चढ़ कर बोला जब वाजपेयी की वाणी वहां मुखर हुई थी। एक एक शब्द का चुन चुन का उपयोग करने वाले वाजपेयी प्रतिकूल परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने का हौसला रखते थे। साथ ही उन्हें अतीत में देखे गए स्वर्णिम भारत का सपना भी याद था। शायद यही वजह है कि उन्होंने लिखा ...

क्षमा करो बापू! तुम हमको,
बचन भंग के हम अपराधी,
राजघाट को किया अपावन,
मंजिल भूले, यात्रा आधी।
जयप्रकाश जी! रखो भरोसा,
टूटे सपनों को जोड़ेंगे।
चिताभस्म की चिंगारी से,
अन्धकार के गढ़ तोड़ेंगे।

भारत को सबसे आगे, ऊंचाई पर, दुनिया की अगुवाई करते देखने का सपना भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की आंखों में पलता था। अपनी चिरपरिचित मुस्कुराहट, सौम्यता, शब्दों की विरासत और कई खट्टी मीठी यादों को पीछे छोड़ कर अनंत यात्रा पर जाते हुए यह पथिक एक संदेश भी देता है

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूं?
अटल सत्य सामने है। कल और आज की राजनीति भी अलग अलग है। इनमें नजर नहीं आएगा अजातशत्रु का अटल चेहरा। उन्हीं के शब्दों में....

सूर्य तो फिर भी उगेगा,
धूप तो फिर भी खिलेगी,
लेकिन मेरी बगीची की
हरी-हरी दूब पर,
ओस की बूंद
हर मौसम में नहीं मिलेगी।

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