बरसात शुरू होने पर हस्तिनापुर सेंचुरी में वापस आ रहे हैं बारहसिंगा, बने पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र

Samachar Jagat | Friday, 06 Jul 2018 11:35:22 AM
After the rainy season, the reindeer is coming back in Hastinapur Century, Became a tourist attraction

अमरोहा। उत्तर प्रदेश में गंगा के किनारे वनाच्छादित क्षेत्र में वन्य प्राणी बारहसिंगा संरक्षण के लिए बनाई गई हस्तिनापुर सेंचुरी मानव हस्तक्षेत के चलते अपने उद्देश्य से भटकने के बावजूद वर्षा ऋतु आने पर उत्तराखण्ड से बारहसिंगों का मूवमेंट सेंचुरी की ओर देखा गया है। मुख्य वन संरक्षक वाईल्ड लाईफ हस्तिनापुर सेंचुरी ललित कुमार वर्मा ने बताया कि विश्व की संकटग्रस्त प्रजातियों की सूची में शामिल बारहसिंगा जो उत्तर प्रदेश का राज्य पशु भी है। अब बरसात शुरू होने पर हस्तिनापुर सेंचुरी में वापस आ रहे हैं। दरअसल यह वन्य जीव सर्दियों में उत्तराखंड की ओर रुख कर लेते हैं। अब बरसात में वहां बाढ आने के कारण ये घर वापसी कर रहे हैं। 

वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूआईआई) के एक अध्ययन में इनके हस्तिनापुर की ओर रुख करने का पता चला है। उनक कहना है कि जीपीएस सैटेलाइट कॉलर की मदद से बारहसिंगा के उत्तराखंड से उत्तर प्रदेश में आने की जानकारी मिली है। पिछले दिनों देहरादून स्थति डब्ल्यूआईआई ने गंगा किनारे उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के हस्तिनापुर में बारहसिंगा पर एक सर्वे किया था। यहां इनकी संख्या करीब 400 पता चली थी। इनमें सबसे ज्यादा उत्तराखंड में मिले थे। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड के झिलमिल ताल के पास इनकी संख्या लोगों को हैरान कर देने वाली रही। बारहसिंगा पर अध्ययन करने वाली विशेषज्ञ टीम वन्यजीव जंतुओं को लेकर समय समय पर अनुसंधान व अध्ययन करती रहती है।, उत्तराखंड का झिलमिल ताल बिजनौर (उत्तर प्रदेश) से लगभग 20 किलोमीटर ऊपर है। लगभग दो माह पूर्व झिलमिल ताल के पास दो मादा बारहसिंगा पर जीपीएस सैटेलाइट कॉलर लगाकर अध्ययन शुरू किया गया था। इनमें से एक उत्तराखंड और दूसरी हस्तिनापुर सेंचुरी पहुंच चुकी है।

मुख्य वन संरक्षक वर्मा ने बताया कि कॉलर की मदद से हर तीन घंटे में बारहसिंगा की लोकेशन मिलती रहती है। प्रदेश के पांच जिलों बिजनौर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, अमरोहा तथा हापुड़ को मिलाकर गंगा नदी के किनारे वनाच्छादित क्षेत्र में 2073 वर्ग किलोमीटर में फैली इस सेंचुरी में अब नाममात्र के जीवजंतु ही शेष बचे हैं। उत्तराखंड के अलग हो जाने के बाद से वन क्षेत्र बढाए जाने के प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि दिनों दिन बढते मानव हस्तक्षेप से वन्यजीवों मे अपेक्षित बढोत्तरी नहीं हो पा रही है। वर्ष 1986 में बनी हस्तिनापुर सेंचुरी की केन्द्र सरकार द्बारा घोषणा वन्यजीव जंतुओं खासतौर से बारहसिंगा को बचाने के लिए ही की गई थी लेकिन सेंचुरी मे स्थानीय लोगों के बढते हस्तक्षेप से इसका उद्देश्य अधूरा ही रह गया। उन्होंने बताया कि वन क्षेत्र में अवैध रूप से खेती करने के मामले हमेशा से चर्चा का बिंदु बने रहते हैं। वन विभाग ने अवैध कब्जे जमाए बैठे लोगों से काफी वन भूमि मुक्त भी कराई गई है, लेकिन अभी भी सेंचुरी घोषित क्षेत्र की जमीन पर अवैध कब्जेदारों का बोलबाला है।

उन्होंने बताया कि इस सबके बावजूद बारहसिंगा की मौजूदगी अमरोहा से लेकर बिजनौर, मुजफ्फरनगर, मेरठ और हापुड़ तक देखी गई है। इसमें डाल्फिन, घडियाल,बारहसिघा के अलावा सांभर तथा तेंदुए, नीलगाय, खरगोश, समेत कई अन्य जीव जंतु रहते हैं। वर्मा ने बताया कि बारहसिंगा वर्षा ऋतु में पहाड़ों से नीचे आ जाते हैं और सर्दियों में वहां वापस लौट जाते हैं। इस तरह इनका लगातार मूवमेंट बना रहता है। मौसम और दलदली जमीन पर बढ रही खेती को भी इनके घर छोड़ने की वजह माना जाता रहा है। बारहसिंगा झुंड में संख्या लगभग 12 के आसपास होती है, इस कारण इसको यह नाम दिया गया। ये दलदली जगह पर पाए जाते हैं। इस कारण इन्हें स्वैम्प डियर भी कहा जाता है। उन्होंने बताया कि ये शाकाहारी होते हैं और इनकी ऊंचाई 130-135 सेमी. होती है। इनका वजन लगभग 180 किग्रा. होता है। वाईल्ड लाईफ अब बारहसिंगा को लेकर काफी संवेदनशील है, और उसके बढोत्तरी व सुरक्षा, संरक्षण के प्रति गंभीर है। केंद्र सरकार द्बारा बनाई गई इस सेंचुरी का उद्देश्य तभी पूरा हो पाएगा जब तक उसमें बाहरी दखलअंदाजी पर पूरी तरह रोक नहीं लग पाती है।-एजेंसी 


 



 

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