जीवन बीमा निगम का आईडीबीआई बैंक की हिस्सेदारी खरीदने का फैसला

Samachar Jagat | Saturday, 07 Jul 2018 11:15:29 AM
Life Insurance Corporation's decision to buy IDBI Bank stake

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देश की सबसे बड़ी और पुरानी जीवन बीमा कंपनी एलआईसी द्वारा कर्ज में डूबे सरकारी बैंक आईडीबीआई की 51 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने का मामला विवादों में घिरता जा रहा है। विपक्ष द्वारा इसे आम जनता की बचत के पैसे का दुरूपयोग करार दिए जाने के बाद अब बैंक अधिकारियों के संघ ने भी इस प्रस्तावित सौदे के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। ऑल इंडिया बैंक आफिसर्स एसोसिएशन (एआईबीओए) ने राष्ट्रपति से इस मामले में दखल देने की मांग की है।

 एसोसिएशन ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर राष्ट्रीय संपत्ति और पीएसयू पीएसबी (पब्लिक सेक्टर बैंक) के संरक्षक के रूप में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया है। एसोसिएशन के महासचिव एस नागराजन की ओर से भेजे गए पत्र में कहा गया है कि एलआईसी को इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक निवेश करने की अनुमति न दी जाए। ऐसोएिशन के मुताबिक खास मामले को लेकर की गई छूट गलत परिपाटी शुरू करेगी। यहां यह उल्लेखनीय है कि सरकारी बैंक आईडीबीआई अभी फंसे हुए कर्ज यानी एनपीए के मामले में अव्वल है। 

इसका एनपीए का बोझ 28 फीसदी हो चुका है, जबकि इसका पांच फीसदी होना भी बैंकों के लिए गहरी चिंता का कारण बन जाता है। एलआईसी की मौजूदा हिस्सेदारी आईडीबीआई में करीब 11 फीसदी है जिसे बढ़ाकर 51 फीसदी करने का फैसला उसने किया हयै। यहां यह बता दें कि मौजूदा कानूनों के मुताबिक एलआईसी किसी कंपनी में 15 फीसदी से ज्यादा इक्विटी नहीं खरीद सकती है। फिर भी राष्ट्रीय बीमा नियामक निकाय इरडा की पिछले शुक्रवार को हैदराबाद में हुई बोर्ड बैठक में स्पेशल केस के रूप में इस सौदे को मंजूरी दी गई। 

आईडीबीआई बैंक की नजर से देखे तो यह बेलआउट निश्चित रूप से उसके लिए बहुत जरूरी था। बैंक को अगर प्रोफेशनल ढंग से चलाया गया और फंसे कर्जों की वसूली का इंतजाम किया जा सका तो इस कदम से उसमें नई जान पड़ सकती है। बाजार ने इसका स्वागत किया है और इस सौदे को इरडा की मंजूरी मिलने के बाद आईडीबीआई के शेयर 10 फीसदी से ज्यादा चढ़ गए हैं। इधर नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार का मानना है कि एलआईसी द्वारा आईडीबीआई बैंक में हिस्सेदारी खरीदे जाने से बैंक मुनाफे में आएगा। एलआईसी में आम लोगों के पैसे डूबने की चिंताओं पर उन्होंने कहा कि आईडीबीआई में निवेश पर एलआईसी को बेहतर रिटर्न प्राप्त होगा। लगता है कि नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने आईडीबीआई में एलआईसी के निवेश पर बेहतर रिटर्न की बात इसलिए कही है क्योंकि सरकारी बैंकों में फंसे कर्ज का निपटारा करने के लिए ‘बैड बैंक’ की स्थापना किए जाने पर विचार चल रहा है।

 सरकारी बैंकों ने फंसे कर्ज का निपटारा करने के लिए बैड बैंक बनाने की केेंद्र सरकार से सिफारिश की है। पंजाब नेशनल बैंक के अध्यक्ष सुनील मेहता की अगुवाई वाली समिति ने इसी सप्ताह सोमवार को इस बारे में अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। ब्लूमवर्ग की रिपोर्ट  के मुताबिक राष्ट्रीय संपत्ति प्रबंधन कंपनी या बैड बैंक बनाने का समर्थन किया है। सरकारी बैंकों का खराब कर्ज इसके हवाले किया जाएगा। सरकार ने जून की शुरुआत में समिति बनाई थी, ताकि पता लगाया जा सके कि बैड बैंक काम कर पाएगा या नहीं। सरकार की मंजूरी के बाद बैड बैंक अस्तित्व में आ जाएगा। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि बैंकों, विदेशी फंड, इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड का बैड बैंक में हिस्सेदारी होगी। वित्तमंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि सरकार ने सुनील मेहता समिति की पांच सूत्री योजना को स्वीकार कर लिया है।


 जल्द ही स्वतंत्र परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनियों व संचालन समितियों का गठन किया जाएगा। बैड बैंक के पास जो भी संपत्ति होगी, उसके मूल्य निर्धारण को विशेषज्ञ होंगे। सार्वजनिक तौर पर ज्यादा बोली लगाने वाले को इसे निश्चित समय में बेचा जाएगा। यहां यह बता दें कि बैड बैंक बैंकों के बड़े कर्ज की जांच कर उनकी जोखिम स्थिति निर्धारित करेगा। संकटग्रस्त संपत्ति के बदले बैड बैंक संबंधित बैंक को 15 प्रतिशत नकद देगा। इसके साथ ही बैड बैंक संकटग्रस्त संपत्ति का मूल्य तय कर निविदा आमंत्रित करेगा। सर्वाधिक बोली लगाने वाला वहीं 15 फीसदी की राशि बैड बैंक को देगा। निजी बोलीकर्ता सामने नहीं आया तो बैड बैंक शेष 85 फीसदी राशि भी बैंक को देगा। इसके अलावा फंसे कर्ज का निपटारा ऋण शोधन एवं दिवाला संहिता के तहत फंसी समितियों का निपटारा किया जाएगा। बैंकों ने बड़े कर्ज की स्थिति का पता लगाने की समिति बनाई है। 

बड़े कर्ज को बट्टे में डालने या पुनर्गठन पर निर्णय नहीं करना चाहते हैं अफसर। इधर सरकार ने भी कर्ज तले दबे सार्वजनिक बैंकों को 2 लाख करोड़ रुपए की आर्थिक मदद देने का फैसला किया है। एक ओर जहां सरकारी बैंकों फंसे कर्ज से उबारने के लिए प्रयत्न किए जा रहे हैं। वहीं रिजर्व बैंक ने हाल में अपनी वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि सरकारी बैंकों का एनपीए (फंसा कर्ज) और बढ़ सकता है। इसमें मार्च 2019 तक 12.2 फीसदी की वृद्धि हो सकती है। एनपीए तले दबे बैंकों में सबसे ज्यादा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि 21 सरकारी बैंकों पर कर्ज बांटने पर अंकुश लगाया गया है क्योंकि इन बैंकों का एनपीए 10 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है। इसीलिए एलआईसी द्वारा कर्ज में डूबे सरकारी बैंक आईडीबीआई की 51 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने का फैसला इसकी पॉलिसी लेने वाले लाखों लोगों के लिए चिंता का सबब बना है।

 असल सवाल एलआईसी का है, जो लाखों पॉलिसीधारकों के पैसों का इस्तेमाल सरकारी कुप्रबंधन से बर्बाद हुए एक बैंक का मालिकाना हक हासिल करने में कर रहा है। इस कदम का बचाव करते हुए दलील दी जा रही है कि इससे एलआईसी का बैंकिंग सेक्टर में प्रवेश हो रहा है और इसके जरिए वह अपने बिजनेस को बहुविध रूप दे सकता है। लेकिन सवाल यह है कि अगर उसे बैंकिंग में आना ही था तो क्या जड़ से एक नया बैंक ही खड़ा करना उसके लिए बेहतर नहीं होता। ध्यान रहे एलआईसी के हालिया निवेश पैटर्न से इस फैसले का कोई मेल नहीं है। वह तो पिछले एक साल से विभिन्न पब्लिक सेक्टर बैंकों में अपनी हिस्सेदारी कम करने में जुटा था। साफ है कि परदे के पीछे से सरकार ने एक डूब रहे बैंक को एलआईसी के मत्थे मढ़ दिया है।

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